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विभाजन की सात योजनायें


में ऐसे आदमी बहुधा लखपति या करोडपति हो जाते हैं जिनके पास कुलीनता या शिक्षा कुछ नहीं होती और सत्पुरुषों अथवा प्रतिभाशाली व्यक्तियों ने भयंकर दरिद्रता में जीवन बिताया है और मरने के पहिले उनकी महानता को किसी ने जाना तक नहीं । हमें इस ख़याल को भी धता बता देनी चाहिए कि कुछ काम करने वा प्रक्रियालों को दूसरों की अपेक्षा जीवन-निर्वाह के लिए अधिक खर्च करना पड़ता है । जितना भोजन-भत्ता एक मजदूर को स्वस्थ रखने के लिए काफ़ी होगा उतना ही एक राजा के लिए भी काफ़ी होगा। बहुत से मज़दूर एक राजा की अपेक्षा बहुत ज्यादा खाते-पीते हैं और उन सबके कपड़े भी तो बड़ी जल्दी फट जाते हैं। यदि हम राजा का भत्ता दूना कर दें तो वह न दूना खाने-पीने लगेगा और न दूनी निश्चिन्तता से सोयेगा।

यहाँ प्रश्न उठता है कि फिर हम कुछ को आवश्यक्ता से अधिक और कुछ को कम क्यों देते हैं ? इसका उत्तर यह है कि हम बहुत करके उन्हें देते नहीं हैं। हमने व्यवस्था नहीं की कि हरएक को कितना मिले। भाग्य और शक्ति पर छोड़ दिया है, इसलिए उनको मिल जाता है। हाँ, राजा और दूसरे राज्याधिकारियों के लिए ज़रूर व्यवस्था की गई है कि उनको खासी रकम मिलनी चाहिए । कारण हम चाहते हैं कि उन का विशेष रूप से आदर-सम्मान हो; किन्तु अनुभव बताता है कि सत्ता आय के परिमाणानुसार नहीं है। पोप के बराबर यूरोप में और किसी का भय नहीं माना जाता; किंतु कोई भी पोप को धनी आदमी खयाल नहीं करता। कभी-कभी तो उसके माता-पिता और भाई-बहिन बहुत विनम्र होते हैं और वह स्वयं अपने दर्जी और पंसारी से भी गरीब होता है । जहाज़ का क्सान प्रति-दिन ऐसे लोगों के साथ भोजन करने बैठता है जो उसके वेतन जितना रुपया पानी में फेंक दें और जरा भी चिंता न करें; किंतु उसकी सत्ता इतनी विस्तृत होती है कि धमराढी-से-घमराढी यात्री भी उसके साथ अभद्रतापूर्ण व्यवहार करने का साहस नहीं कर मकता । किसी फौजी पल्टन का कप्तान भले ही ग़रीब-से-गरीब क्यों न हो और उसके हरएक अधीनस्थ की आमदनी उसकी अपेक्षा दूनी से