पृष्ठ:समाजवाद पूंजीवाद.djvu/१५५

यह पृष्ठ अभी शोधित नहीं है।

१४८ समाजवाद : पूंजीवाद बैंकों के पास हजारों श्रादमियों का लाखों रुपया जमा रहता है। इसी रुपये को वे उधार देकर बहुत सारा मुनाफा कमाते हैं । यदि बैंकों में रुपया जमा कराने वाले एक साथ अपना सब रुपया वापस निकालने की सोचले तो बैंकों के लिए मुश्किल हो जाय और उन्हें अपना कारबार बन्द कर देना पड़े। बैंक जो रुपया उधार देते हैं उसको अतिरिक्त आजीविका ही समझना चाहिए । किन्तु बैंक ऐसा नहीं समझते मालूम होते हैं। वे तो इस विश्वास पर रुपया देते हैं कि कर्ज लेने वाला आसानी से रुपया वापस चुका देगा। किन्तु क्या साख के आधार पर मकान, कारखाने आदि बनाये जा सकते हैं ? नहीं । वास्तव में रुपया उधार देने का मतलब होता है कि बैंक ने हमारे लिए वे सब ठोस चीजें सुलभ कर दी हैं जिनकी हमको जरूरत हो सकती है। जो लोग ऐसा समझते हैं कि एक बैंक ने पाँच हजार रुपया उधार देकर उसके साथ पांच हजार रुपये की सास भी दी है और इस प्रकार दस हजार रुपये का व्यवहार किया है, वे भूल करते हैं । साख के आधार पर उद्योगों का विस्तार नहीं हो सकता। दो रुपया दो ही रुपये का काम देगा, चार का नहीं। ___ रुपये की दर पूर्ति और मांग (supply and demand) के सिद्धान्त के अनुसार स्थिर होती है । जव रुपया कम हो जाता है और मांग बढ़ जाती है तो उसकी दर बढ़ जाती है और जब रुपया अधिक मात्रा में सुलभ होता है और मांग कम होती है तो उसकी दर घट जाती है। ___बैंक जब अपना रुपया विवेक-पूर्वक उधार देते हैं तो सुरक्षित रहते हैं। यदि वे हानिकारक कामों में रुपया लगावें, ग़लत लोगों पर भरोसा करें या सट्टा करें तो अपने-आपको और अपने ग्राहकों को बर्बाद कर दे सकते हैं, जब बहुत सारे बैंक थे, तब बहुधा ऐसा होता था । किन्तु अब बड़े बैंक छोटे बैंकों को हड़प कर इतने कम और इतने बड़े हो गये हैं कि वे एक दूसरे को नहीं टूटने देते और न सरकारें ही उनको टूटने देती हैं। किन्तु यदि कोई सरकार पूँजी और साख पर भारी कर लगावे तो नतीजा यह होगा कि सब साख नष्ट हो जायगी, बैंक दिवाला निकाल देंगे