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जूलूस
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आँखें फेर ली; पर उसके एक चितवन में कुछ ऐसा धिक्कार, कुछ ऐसी लज्जा, कुछ ऐसी व्यथा, कुछ ऐसी घृणा भरी हुई थी कि वीरवलसिंह की देह में सिर से पांव तक सनसनी-सी दौड़ गई। वह अपनी दृष्टि में कभी इतने हल्के, इतने दुर्बल, इतने ज़लील न हुए थे।

सहसा एक युवती ने दारोग़ाजी की तरफ देखकर कहा--कोतवाल साहब, कहीं हम लोगों पर डण्डे न चला दीजिएगा ! आपको देखकर भय हो रहा है।

दूसरी बोली--आपही के कोई भाई तो थे, जिन्होंने उस दिन माल के चौरस्ते पर इस वीर पुरुष पर आघात किये थे !

मिट्ठन ने कहा--आपके कोई भाई न थे, आप खुद थे।

बीसियों ही मुहों से आवाजें निकलीं--अच्छा, यह वही महाशय हैं ? महाशय, आपको नमस्कार है ! यह आप ही की कृपा का फल है कि आज हम भी आपके डण्डे के दर्शनों के लिए आ खड़ी हुई हैं !

वीरबल ने मिटुन बाई की ओर आँखों का भाला चलाया; पर मुंह से कुछ न बोले। एक तीसरी महिला ने फिर कहा-हम एक जलसा करके आपको जयमाल पहनायेंगे और आपका यशोगान करेंगे।

चौथी ने कहा-आप बिलकुल अँगरेज मालूम होते हैं, जभी इतने गोरे हैं !

एक बुढ़िया ने आँखें चढ़ाकर कहा--मेरी कोख में ऐसा बालक जन्मा होता, तो उसकी गर्दन मरोड़ देती!

एक युवती ने उसका तिरस्कार करके कहा--आप भी खूब कहती हैं माताजी, कुत्ते तक तो नमक का हक़ अदा करते हैं, यह तो आदमी हैं ।

बुढ़िया ने झल्लाकर कहा-पेट के गुलाम, हाय पेट ! हाय पेट !

इस पर कई स्त्रियों ने बुढ़िया को आड़े हाथों लिया और वह बेचारी लज्जित होकर बोली--अरे, मैं कुछ कहती थोड़े ही हूँ ; मगर ऐसा आदमी भी क्या, जो स्वार्थ के पीछे अन्धा हो जाय ।

वीरबलसिंह अब और न सुन सके। घोड़ा बढ़ाकर जुलूस से कई गज़ पीछे चले गये। मर्द लजित करता है, तो हमें क्रोध आता है। स्त्रिया