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समर-यात्रा
 

वह एक-एक घड़ा खून बहा देना चाहता था। खून उसे कभी इतना प्यारा न था। खून में इतनी उत्तेजना है, इसकी उसे ख़बर न थी।

वह पूरे जोर से लकड़ी चला रहा था। मिसेज़ सकसेना कब आकर उसके सामने खड़ी हो गई,उसे कुछ पता न चला। जब वह जमीन पर गिर पड़ी,तब उसे जैसे होश आ गया। उसने लकड़ी फेंक दी और वहीं निश्चल,निःस्पन्द खड़ा हो गया, मानो उसका रक्त-प्रवाह रुक गया है।

चारों स्वयंसेवकों ने दौड़कर मिसेज सकसेना को पंखा झलना शुरू किया। दुकानदार ठण्डा पानी लेकर दौड़ा। एक दर्शक डाक्टर को बुलाने भागा;पर जयराम वहीं बेजान था,जैसे स्वयं अपने तिरस्कार-भाव का पुतला बन गया हो। अगर इस वक्त कोई उसके दोनों हाथ काट डालता,कोई उसकी आँखें लाल लोहे से फोड़ देता,तब भी वह चूँ न करता।

फिर वहीं सड़क पर बैठकर उसने अपने लज्जित, तिरस्कृत,पराजित मस्तक को भूमि पर पटक दिया और बेहोश हो गया।

उसी वक्त उस काले मोटे शराबी ने बोतल ज़मीन पर पटक दी और उसके सिर पर ठंडा पानी डालने लगा।

एक शराबी ने लैसंसदार से कहा--तुम्हारा रोज़गार अन्य लोगों की जान लेकर रहेगा। श्राज तो अभी दसरा ही दिन है।

लैसंसदार ने कहा-कल से मेरा इस्तीफ़ा है। अब स्वदेशी कपड़े का रोज़गार करूँगा,जिसमें जस भी है और उपकार भी।

शराबी ने कहा -- घाटा तो बहुत रहेगा।

दुकानदार ने किस्मत ठोककर कहा-घाटा-नफा तो ज़िन्दगानी के साथ है।