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समर-यात्रा
 


एक दर्शक ने कहा-खड़े हैं, तो तुमसे मतलब ? सड़क तुम्हारी नहीं है। तुम गरीबों को लूटे जाओ। किसी के बाल-बच्चे भूखों मरें, तुम्हारा क्या बिगड़ता है। ( दूसरे शराबियों से ) क्या यारो, अब भी पीते जाओगे! जानते हो, यह किसका हुक्म है ? अरे कुछ भी तो शर्म हो !

जयराम ने दर्शकों से कहा-आप लोग यहां भीड़ न लगायें और न किसी को भला-बुरा कहें।

मगर दर्शकों का समूह बढ़ता जाता था। अभी तक चार-पांच आदमी बेग़म बैठे हुए कुल्हड़-पर-कुल्हड़ चढ़ा रहे थे। एक मनचले आदमी ने जाकर उस बोतल को उठा लिया, जो उनके बोच में रखी हुई थी और उसे पटकना चाहता था कि चारों शराबी उठ खड़े हुए और उसे पीटने लगे। जयराम और उनके स्वयंसेवक तुरत वहाँ पहुँच गये और उसे बचाने की चेष्टा करने लगे कि चारों उसे छोड़कर जयराम की तरफ लपके। दर्शकों ने देखा कि जयराम पर मार पड़ा चाहती है, तो कई आदमी झल्लाकर उन चारों शराबियों पर टूट पड़े। लातें, घूँसे और डण्डे चलने लगे। जयराम को इसका कुछ अवसर न मिलता था कि किसी को समझाये। बस, दानों हाथ फैलाये उन चारों के वारों से बच रहा था। वह चारों भी पारे से बाहर होकर दर्शकों पर डण्डे चला रहे थे। जयराम दोनों तरफ से मार खाता था। शराबियों के वार भी उसी पर पड़ते थे, तमाशाइयों के वार भी उसी पर पड़ते थे; पर वह उनके बीच से हटता न था। अगर वह इस वक्त अपनी जान बचाकर हट जाता, तो शराबियों की ख़ैरियत न थी। इसका दोष कांग्रेस पर पड़ता। वह कांग्रेस को इस आक्षेप से बचाने के लिए अपने प्राण देने पर तैयार था। मिसेज़ सकसेना को अपने ऊपर हँसने का मौक़ा वह न देना चाहता था।

आख़िर उसके सिर पर एक डण्डा ज़ोर से पड़ा कि वह सिर पकड़कर बैठ गया। आँखों के सामने तितलियां उड़ने लगीं। फिर उसे होश न रहा।

( ४ )

जयराम सारी रात बेहोश पड़ा रहा। दूसरे दिन सुबह को जब उसे होश आया, तो सारी देह में पीड़ा हो रही यो और कमज़ोरी इतनी थी कि रह-