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क़ानूनी कुमार
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नहीं हैं। यह पराधीन, गुलाम भारत है, जहाँ ऐसी बातें इस बीसवीं सदी में भी संभव हैं। उफ़ ! कितना शक्ति का अपव्यय हो रहा है। (रिपोर्ट निकालकर ) ओह ! ५० लाख आदमी केवल भिक्षा मांगकर गुज़र करते हैं। और क्या ठीक है कि संख्या इनकी दुगुनी न हो। यह पेशा लिखना कौन पसंद करता है। एक करोड़ से कम भिखारी इस देश में नहीं हैं। यह तो उन भिखारियों की बात हुई, जो द्वार-द्वार झोली लिये घूमते हैं। इसके उपरान्त टीकाधारी, कोपीनधारी और जटाधारी समुदाय भी तो है, जिसकी संख्या कम से कम दो करोड़ होगी। जिस देश में इतने हरामख़ोर मुफ्त का माल उड़ानेवाले, दूसरों की कमाई पर मोटे होने वाले प्राणी हों, उसकी दशा क्यों न इतनो हीन हो। आश्चर्य यही है कि अब तक यह देश ज़ीवित कैसे है ( नोट करता है ) एक बिल की सख्त ज़रूरत है, तुरंत पेश करना चाहिए-नाम हो'भिखमंगा-बहिष्कार-बिल !' खूब जूतियाँ चलेंगी, धर्म के सूत्रधार खूब-खूब नाचेंगे, खूप गालियां देंगे, गवर्नमेंट भी कन्नी काटेगी; मगर सुधार का मार्ग तो कंटकाकीर्ण है हो । तीनों बिल मेरे ही नाम से हों, फिर देखिए कैसी खलबली मचती है।

(आवाज़ आती है-चाय गरम ! चाय गरम !! मगर ग्राहकों की संख्या बहुत कम है। कानूनी कुमार का ध्यान चायवाले की ओर आकर्षित हो जाता है)

कानूनी-(आप-ही-आप) चायवाले की दुकान पर एक भी ग्राहक नहीं, क्या मूर्ख देश है! इतनी बलवर्धक वस्तु और ग्राहक कोई नहीं! सभ्य देशों में पानी की जगह चाय पो जाती है। (रिपोर्ट देखकर ) केवल इंगलैंड में ५ करोड़ पौंड की चाय जाती है । इंगलैंडवाले मूर्ख नहीं हैं। उनका आज संसार पर आधिपत्य है, इसमें चाय का कितना बड़ा भाग है, कौन इसका अनुमान कर सकता है। और, यहाँ बेचारा चायवाला खड़ा है, और कोई उसके पास नहीं फटकता। चीनवाले चाय पी-पीकर स्वाधीन हो गये ; मगर हम चाय न पीयेंगे। क्या अक़ल है ! गवर्नमेंट का सारा दोष है। कीटों से भरे हुए दूध के लिए इतना शोर मचता है। मगर चाय को कोई नहीं पूछता, जो कीटों से ख़ाली,उत्तेजक और पुष्टिकारक है। सारे देश की मति