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समर-यात्रा
 

मैकू---क्या तुम्हारी कचहरी में भी वही घूस चलेगा काकी ? हमने तो समझा था, यहाँ ईमान का फैसला होगा।

नोहरी---चलो, रहने दो। मरती दाई राज मिला है, तो कुछ तो कमा लूँ।

गगा हँसता हुआ बोला---मैं तुम्हें घूस दूंगा काकी । अबकी बाजार जाऊँगा, तो तुम्हारे लिए पूर्वी तमाखू का पत्ता लाऊँगा।

नोहरी---तो बस, तेरी ही जीत है। तू ही जाना।

मैकू---काकी, तुम न्याय नहीं कर रही हो ।

नोहरी---अदालत का फैसला कभी दोनों फरीक ने पसन्द किया है कि तुम्हीं करोगे?

गंगा ने नोहरी के चरण छूये, फिर भाई से गले मिला और बोला---कल दादा को कहला भेजना कि मैं जाता हूँ।

एक आदमी ने कहा---मेरा भी नाम लिख लो भाई--सेवाराम ।

सबने जय-घोष किया। भजनसिंह जाकर नायक के पास खड़ा हो गया। भजनसिंह दस-पांच गांवों में पहलवानी के लिए मशहूर था। वह अपनी चौड़ी छाती ताने, सिर उठाये नायक के पास खड़ा हुआ, तो जैसे मण्डप के नीचे एक नये जीवन का उदय हो गया।

तुरन्त ही तीसरी आवाज़ आई---मेरा नाम लिखो---घूरे ।

यह गांव का चौकीदार था। लोगों ने सिर उठा-उठाकर उसे देखा। सहसा किसी को विश्वास न पाता था कि घूरे अपना नाम लिखायेगा।

भजन सिंह ने हंसते हुए पूछा---तुम्हें क्या हुआ है घूरे ?

घूरे ने कहा---मुझे भी वही हुआ है, जो तुम्हें हुआ है । बीस साल तक गुलामी करते-करते थक गया।

फिर आवाज़ आई---मेरा नाम लिखो---काले खां।

वह जमींदार का सहना था, बड़ा ही जाबिर और दबंग। फिर लोगों को आश्चर्य हुआ।