यह पृष्ठ प्रमाणित है।
१७
सौत
 


अपनी खातिर से नहीं वो तुम्हें मेरी खातिर से यह काम करना ही पड़ेगा।

पण्डितजी सरल स्वभावके मनुष्य थे। हासी तो उन्होंने न भरी, पर बार-बार कहने से वे कुछ-कुछ राजी अवश्य हो गये। उस तरफसे इसी की देर थी। पंडितजी को कुछ भी परिश्रम न करना पड़ा। गोदावरी की कार्य-कुशलता ने सब काम उनके लिये सुलभ कर दिया। उसने इस काम के लिये अपने पास से केवल रुपये ही नहीं निकाले, किन्तु अपने गहने और कपड़े भी अर्पण कर दिये। लोकनिन्दा का भय इस मार्ग में सबसे बड़ा काटा था। देवदत्त मन में विचार करने लगे कि जब मैं मौर सजाकर चलूँगा तब लोग मुझे क्या कहेंगे? मेरे दफ्तर के मित्र मेरी हँसी उड़ायेंगे और मुस्कुराते हुए कटाक्षों से मेरी ओर देखेंगे। उनके ये कटाक्ष छुरीसे भी ज्यादा तेज होंगे। उस समय मैं क्या करूँगा?

गोदावरीने अपने गांवमें जाकर इस कार्य को प्रारम्भ कर दिया और इसे निर्विघ्न समाप्त भी कर डाला। नयी बहू घर में आ गई। उस समय गोदावरी ऐसी प्रसन्न मालूम हुई मानो वह बेटे का ब्याह कर लाई हो। वह खूब गाती-बजाती रही। उसे क्या मालूम था कि शीघ्र ही उसे इस गाने के बदले रोना पड़ेगा।

कई मास बीत गये। गोदावरी अपनी सौतपर इस तरह शासन करती थी मानो वह उसकी सास हो, तथापि वह यह बात कभी न भूलती थी कि मैं वास्तव में उसकी सास नहीं है। उधर