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बडे घरकी बेटी
 


बदन में ज्वाला-सी दहक उठी। बोली, जिसने तुम्हे यह आग लगाई है, उसे पाऊ तो मुह झुलस दूँ।

श्रीकण्ठ––इतनी गरम क्यों होती हो, बात तो कहो ?

आनन्दी––क्या कहूँ, यह मेरे भाग्य का फेर है। नहीं तो एक गंवार छोकरा जिसको चपरासीगिरी करने का भी ढग नहीं, मुझे खडाऊ से मारकर यों न अकड़ाता।

श्रीकण्ठ––सब साफ-साफ हाल कहो तो मालूम हो। मुझे तो कुछ पता नहीं।

आनन्दी––परसों तुम्हारे लाडले भाई ने मुझसे मांस पकाने को कहा। धी हांडी में पावभर से अधिक न था। वह मैंने सब मांस में डाल दिया। जब खाने बैठा तो कहने लगा,दालमें धी क्यों नहीं है? बस, इसीपर मेरे मैके को भला-बुरा कहने लगा। मुझसे न रहा गया, मैंने कहा कि वहां इतना घी तो नाई-कहार खा जाते हैं और किसी को जान भी नहीं पड़ता। बस, इतनीसी बातपर उस अन्यायी ने मुझपर खडाऊ फेंक मारी। यदि हाथ से न रोक लेती तो सिर फट जाता। उसीसे पूछो कि मैंने जो कुछ कहा है वह सच है या झूठ।

श्रीकण्ठ की आँँखें लाल हो गई। बोले, यहाँँतक हो गया। इस छोकडे़ का यह साहस।

आनन्दी स्त्रियोंके स्वभावानुसार रोने लगी। क्योंकि आँसू उनकी पलकोंपर रहते हैं। श्रीकण्ठ बडे़ धैर्यवान् और शान्त पुरुष थे। उन्हें कदाचित् ही कभी क्रोध आता था, पर स्त्रियोंके आँसू पुरुषोकी क्रोधाग्नि भड़काने में तेल का काम देते है। रातभर करवटें बदलते रहे। उद्विग्नता के कारण, पलक तक नहीं झपकी।