पृष्ठ:सचित्र महाभारत.djvu/९०

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सचित्र महाभारत [पहला खण्ड अर्जुन ने उत्तर दिया : हे अग्नि ! आपकी इच्छा हम अवश्य पूरी करेंगे। पर हमारे पास न तो ऐसा धनुप ही है जो देर तक हमारी भुजाओं के वेग को सह सके और न ऐसा रथ ही है जो अत्र रखने और अधिक समय तक युद्ध में काम देने के योग्य हो। कृष्ण के पास भी कोई ऐसा हथियार नहीं है जो उनके चलाने योग्य हो। अर्जुन की बात सुनते ही अग्नि न जल के देवता वरुण को याद किया। वरुण देवता के आने पर अग्नि महाराज बोले : हे जलेश्वर ! सोमराज ने जो प्रचण्ड धनुष, कभी नाश न होनेवाली दो तरकशें, और बन्दर के निशानेवाला रथ तुम्हें दिया था, उन सब चीजों को ले आओ। अर्जुन उनसे बहुत बड़ा काम करेंगे। वरुणराज ने अग्नि की प्रार्थना मान ली और हमंशा तीरी से भर रहनेवाले तरकश के साथ गाण्डीव नाम का प्रसिद्ध धनुप और वानर के चिह्नवाला, बड़ तंज घोड़ों से जुता हुआ, तथा लड़ाई के सामान से भरा हुआ एक रथ लाकर अर्जुन को दिया। अग्नि ने कृष्ण को सुदर्शनचक्र नाम का एक बड़ा अच्छा अस्त्र देकर कहा :हे कृष्ण ! यह चक्र फेंके जाने पर शत्र को मार कर फिर आपके हाथ में लौट आवेगा। तब अस्त्र-शस्त्र धारण कर और ग्थ में बैठ दोनों वीर बड़े प्रसन्न हुए और अग्नि से बोल : भगवन् ! आप बे-खटके खाण्डव वन के चारों ओर प्रज्वलित होकर उसे जलाइए। इस रथ और इन हथियारों की बदौलत अब हमें किसी का डर नहीं । अब हमें कोई नहीं जीत सकता। यह सुन भगवान् अग्नि ने बड़ा ही उग्र रूप धारण किया और अपनी सातों जी. निकाल कर खाण्डव जलाना आरम्भ किया। कृष्ण और अर्जुन वन के दोनों ओर खड़े होकर जीवधारियों को आग के मुँह में डालने लगे। क्या पशु, क्या पक्षी, कोई भी अर्जुन के बाणों और कृष्ण के चक्र से भागने न पाया। तालाब तेज़ आँच से उबलने लगे। मछलियों ने छटपटाकर प्राण दे दिये। धीरे धीरे जब जलती हुई आग की लपटें आकाश तक पहुँची और देवताओं का जलाने लगी तब इन्द्र ने पानी बरसाना प्रारम्भ किया। पर आग की विकट गर्मी से पानी की धारें आकाश ही में सूखकर न मालूम कहाँ चली गई। तब इन्द्र को बड़ा क्रोध आया। सब बादलों को इकट्ठा करके वह मूसलधार पानी बरसाने लगा। पानी की धारा खाण्डव वन के ऊपर पड़ती देख अर्जुन ने अपने बाणों के जाल से आकाश ढक दिया। इससे एक बूंद भी पानी अग्नि तक न पहुँचा। सर्पराज तक्षक इस समय कुरुक्षेत्र गये थे। पर उनका पुत्र अश्वसेन खाण्डव वन में ही रहता था। वह, आग से कई बार भागने की चेष्टा करने पर भी, अर्जुन के मारे न भागने पाया । तब तक्षक की स्त्री ने पुत्र को बचाने की चेष्टा करने में खुद अपने प्राण गँवाये। यह दशा देख कर इन्द्र ने प्रचण्ड बाण-वर्षा के द्वारा अर्जुन को थोड़ी देर बेहोश करके अश्वसेन को भाग जाने का अवसर दिया। अर्जुन इस धोखेबाजी से क्रुद्ध होकर इन्द्र से और भी घोर युद्र करने लगे। इन्द्र की प्रेरित बिजली की निरन्तर कड़क, वनों की लगातार मार और बादलों की घटाओं की विकट गर्जन से मानो प्रलय-काल आ पहुँचा । पर सब प्रकार के युद्धों में निपुण अर्जुन ने उत्तमोत्तम दिव्य अस्त्र चला कर, इन्द्र के शस्त्रास्त्रों को एकदम व्यर्थ कर दिया । अन्त में उन्होंने मन्त्र से पवित्र किये हुए वायु के अस्त्र-द्वारा मेघों