पृष्ठ:सचित्र महाभारत.djvu/८२

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सचित्र महाभारत [पहला खण्ड यह कह कर धृतराष्ट्र ने तुरन्त उक्त महात्माओं को सलाह करने के लिए बुला भेजा। भीष्म ने कहा :----पाण्डु और धृतराष्ट्र हमारे लिए दोनों बराबर हैं । इसलिए ऐसे घरेलू झगड़े को हम किसी तरह पसन्द नहीं करते। हमारी समझ में पाण्डवों को आधा राज्य देकर उनके साथ मेल कर लेना दोनों पक्षवालों के लिए अच्छा होगा। इसमें कोई संदेह न समझिए । पुत्र दुर्योधन ! जिस तरह तुम इसको अपने बाप दादे का राज्य समझत हो, उमी तरह पाण्डव लोग भी समझते हैं । इसलिए किस युक्ति से तुम अकेले अपने ही को राज्य करने का अधिकारी समझते हो? मित्र की तरह यदि तुम पाण्डवों को आधा राज्य दे दागे, जिसके पाने का उनको हक़ भी है, तो इसमें दोनों ही की भलाई होगी। इसके सिवा तुम्हारा यश भी बहुत दिनों तक बना रहेगा ! द्रोणाचार्य ने कहा :---महाराज ! शास्त्रों में लिखा है कि सलाह देने के लिए आये हुए हितैषियों को उचित है कि अपने मन की सच्ची बात निडर होकर कह दें । इसलिए हम साफ साफ कहते हैं कि जो राय भीष्म की है वही हमारी भी है। हमारी सलाह है कि पाण्डवों को भेंट करने के लिए बहुमूल्य चीजें लेकर कोई प्रियभाषी मनुष्य शीघ्र ही पाञ्चाल देश जाय । वह द्रपद से भाई-बन्धुओं में मल होने के गुणों का वर्णन करके पाण्डवों के यहाँ आने की बात चलावे । यदि राजा द्रपद उनको यहाँ आने की सम्मति दें तो आप का कोई पुत्र, सजी हुई सेना लेकर, उनके स्वागत के लिए जाय । भीष्म की और हमारी, दोनों ही की, यह राय है कि पाण्डवों के साथ श्रापको भाइयों का सा व्यवहार करना ही इस समय सब से अच्छा है। भीष्म और द्रोण के उपदेश को सुन कर्ण को क्रोध हा आया । वे बोल : महाराज ! आप धन के द्वारा जिनका सदा सत्कार किया करते हैं उन्होंने आपका अच्छी सलाह नहीं दी। इससे बढ़कर निन्दा की बात और क्या हो सकती है ? बड़े आश्चर्य की बात है कि ये भलं आदमी अपने मन की बात छिपा कर, अच्छी सलाह देने के बहाने, वैरी की तरफदारी करते हैं। अब हम समझे कि जिसे रुपये की तङ्गी होगी उससे सच्ची सलाह का मिलना मुश्किल है । निर्धन आदमी की मित्रता पर कभी विश्वास न करना चाहिए । वह तो रुपये का मित्र होता है। इसलिए सलाह देनेवालों के मन के भाव अच्छी तरह समझ कर तब उनका कहना आप कीजिएगा। द्रोण ने कहा :-हे कर्ण ! तुम अपने मन के दोष से ही हमका दोषी ठहरात हा । तुम्हारं मन में पाप है, इससे तुम समझते हो कि हम भी वैसे ही हैं । जो हो, हमनं कुरुवंश के लिए जो लाभदायक और अच्छा समझा वही कह दिया। विदुर ने कहा :-महाराज ! आपके बन्धु-बान्धव उपदेश दे सकते हैं। पर आप उसे यदि सुनना ही न चाहें तो वह व्यर्थ है । कुरुओं में श्रेष्ठ भीष्म और आचार्य द्रोण ने जो बातें आपसे कही हैं वे सब धर्म के अनुकूल हैं और आपके मतलब की हैं। किन्तु कर्ण ने उन्हें लाभदायक नहीं समझा । इन दोनों में कौन अधिक बुद्धिमान और आपका सच्चा मित्र है, यह इस समय आप ही विचार कर देखिए । महाराज ! आप यह भी सोच लीजिएगा कि यदि पाण्डव लोग रुष्ट हो जाएंगे तो खुद देवता भी इन्हें जीत नहीं सकते । इसके सिवा यादवों में श्रेष्ठ कृष्ण और बलदेव उनके पक्ष में हैं। विवाह होने से अब पाञ्चाल लोग भी उनके सम्बन्धी हो गये हैं। और नहीं तो उनके इस अधिक बल ही का खयाल करके इस समय अपने सम्मान की रक्षा कीजिए और पाण्डवों को राज्य का वह हिस्सा, जिसके पाने का उनको हक़ है, देकर पुरोचन के किये हुए पाप के कलंक का धब्बा मिटाइए । इससे पुराने वैरी पद से भी मित्रता हो जायगी। पाण्डवों के दर्शन की इच्छा रखनेवाले नगरनिवासी भी इसे पसन्द करेंगे! दुर्योधन, कर्ण, शकुनि श्रादि बड़े ही अधार्मिक और दुर्बुद्धि हैं। हमने पहले ही कहा था कि यदि आप सावधान न रहेंगे तो इनके अपराध से रघुवंश शीघ्र ही नष्ट हो जायगा।