पृष्ठ:सचित्र महाभारत.djvu/५९

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पहला खण्ड ] धृतराष्ट्र के पुत्रों का पाण्डवों पर अत्याचार बड़े चालाक और धूर्त मन्त्री को उन्होंने सब बातें पहले ही से सिखला रक्खी थीं। सूचना पाते ही एक दिन वह राज-सभा में सब लोगों के सामने कहने लगा : वारणावत् बहुत बड़ा नगर है। वह बड़ा ही मनोहर और रमणीक स्थान है। वहाँ भगवान् भवानी-पति विराजमान हैं। उनके पूजन और दर्शन के लिए इस समय नाना देशों से लोग वहाँ श्रा इस प्रशंसा को सुन कर पाण्डवों के मन में वारणावत् नगर देखने की इच्छा हुई । धृतराष्ट्र ने देखा कि वारणावत् जाने के लिए पाण्डव बहुत उत्सुक हो रहे हैं। दुर्योधन को प्रसन्न करने का उन्होंने यह अच्छा मौका समझा। यद्यपि अधर्म के डर से उन्हें बहुत कुछ सङ्कोच हुआ, तथापि अपने प्यारे पुत्र दुर्योधन के दबाव से इस मौके को हाथ से जाने दना उन्होंने मुनासिब न जाना। मन ही मन कुण्ठित होकर पाण्डवों को जाल में फाँसने के लिए वे तैयार हुए। उन्हें बढ़ावा देने के लिए-उनसे मन के अभिलाप को और अधिक बढ़ाने के लिए-वे बोले : हे पुत्र ! सभी हमसे वारणावत् की बड़ाई करते हैं। इच्छा हो तो तुम सब जाकर कुछ दिन वहीं सुख से रह सकते हो। युधिष्ठिर बड़े बुद्धिमान थे । धृतराष्ट्र की बात सुन कर वे समझ गये कि ज़रूर कुछ दाल में काला है। परन्तु इस कुटिल-जाल से बचने का कोई अच्छा उपाय न देख लाचार होकर उन्होंने वारणावत् जाना अङ्गीकार कर लिया। ___ इस घटना से दुर्योधन को परमानन्द हुआ। उनके आनन्द की सीमा न रही। पहले ही से धृतराष्ट्र से बिना पूछे ही एक बड़े ही घोर पाप की बात व मन ही मन सोचते रहे थे। दुर्योधन को उसके कर दिखाने का अब अच्छा अवसर मिला। उन्होंने पुरोचन नाम के एक महा दुराचारी मन्त्री को बुलाया और प्रेमपूर्वक उसका हाथ पकड़ कर बोले : हे पुरोचन ! धन-सम्पत्ति से भरा हुआ यह इतना बड़ा राज्य सिर्फ हमारा ही नहीं है। तुम्हारा भी है। जिस तरह इसकी रक्षा हो उसके लिए तुम्हें भी यन करना चाहिए। जिस बात से यह बना रहे उसे करने में तुम्हें भी तैयार रहना चाहिए। तुम्हें छोड़ कर और कोई ऐसा हमें नहीं देख पड़ता जिससे हम अपने मन की बात सङ्कोच छोड़ कर कह सकें । एक तुम्हीं ऐसे हो जिनसे कोई बात कहने में हमें किसी तरह का सन्देह नहीं हाता । एक तुम्ही हमारे सबसे अधिक विश्वास-पात्र मन्त्री हो । इससे जो कुछ हम तुमसे कहने जाते हैं उसे कदापि किसी से न कहना। वारणावत् में जो महादेव का उत्सव होनेवाला है उसमें पाण्डव लोग जायँगे। उनका इरादा वहाँ कुछ दिन रह कर सैर करने का है। तुम एक काम करा। एक बहुत तज रथ पर सवार होकर आज ही वारणावत् जाव। लाख, सन, साल आदि जितनी चीजें और जितनी लकड़ियाँ ऐसी हैं कि आग छू जाते ही एकदम जल उठे, उनसे वहाँ एक बहुत ही सुन्दर चार पौर का घर बनवाना। फिर मिट्टी में बहुत सा तेल-लाख, लोबान आदि मिला कर उसका प्लास्टर बनवा कर इस घर की दीवारों पर उसका खूब लेप करा देना। इसके बाद बड़ी सावधानी से बारूद आदि आग से उड़नेवाली चीजें चारों तरफ़ गुप्त जगहों में छिपा कर रख देना। पाण्डवों के वारणावत् पहुँचने पर, अच्छा मौका पाते ही, उस घर में रहने के लिए उनसे बड़े आदर-सत्कार से प्रार्थना करना । जहाँ तक हो सके दिव्य से दिव्य रथ, पालकी, पलँग आदि देकर उनको खुश करना । जब उन्हें सब तरह का विश्वास हो जाय और कुछ दिन वहाँ रहते हो जाये तब एक रात को छिपे छिपे इस इस घर में आग लगा कर पाण्डवों को वहीं भस्म कर डालना । देखा, पिता और पुरवासियों को इस बात की ज़रा भी सुगसुग न लगने पावे । ऐसा प्रबन्ध करना जिसमें वे समझे कि अचानक आग लग जाने से ही पाण्डव जल मरे हैं। ऐसा न हो कि पाण्डवों के मारने का कलङ्क हमारे सिर थापा जाय। इससे तुम्हें बड़ी सावधानी से काम करना होगा।