पृष्ठ:सचित्र महाभारत.djvu/४४

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सचित्र महाभारत [पहला खण्ड तुम लोग यदि हमको अच्छा भोजन कगो तो हम इन मुट्ठी भर तिनकों की मदद से तुम्हारा गेंद कुएँ से निकाल दें। उसके अनन्तर उस ब्राह्मण ने मुट्ठी भर सीकें लेकर पहले एक सींक से उस गेंद को छेद दिया। फिर एक और सींक से उस पहली सींक की ऊपरी नोक को छेदा । इसी तरह एक के द्वारा दूसरी सींक को छेद कर कुाँ के मुँह तक सींकों की एक रस्सी सी बना दी और उस गेंद को महज में निकाल लिया। राजकुमार इस कौशल को बड़े आश्चर्य और बड़े विस्मय से आँखें फाड़ फाड़ कर देखते रहे। गेंद पाकर वे बहुत प्रसन्न हुए। उन्होंने उस ब्राह्मण को प्रणाम किया और बोले : हे ब्राह्मणश्रेष्ठ ! आप कौन हैं ? अस्त्र-विद्या में आपकी ऐसी योग्यता हमने और कहीं नहीं देखी। आज्ञा दीजिए, हम आपके इस उपकार के बदले आपकी कौनसी सेवा करें। ब्राह्मण ने कहा-तुम महात्मा भीष्म से हमारा वृत्तान्त जाकर कहो; व हमें अवश्य ही पहचान लेंगे। राजकुमारों ने यह बात मान ली। वे पितामह भीष्म के पास गये। उनसे उन्होंने सारा हाल क्रम क्रम से कह सुनाया। भीष्म ने सब बातें सुनते ही उस गुणवान ब्राह्मण को पहचान लिया। उन्होंने अनुमान किया कि वे द्रोणाचार्य के सिवा और कोई नहीं। भीष्म ने उन्हें बड़े आदर से बुलवा भेजा। आने पर उनसे पूछा कि कृपा करके अपना नाम-धाम बतलाइए और कहिए कि किस मतलब से आप हम्तिनापुर पधारे है। द्रोण बोल हम महर्षि भरद्वाज के पुत्र हैं। हमारा नाम द्रोण है। महर्पि अग्निवेश के आश्रम में हम धनुर्वेद और अस्त्रविद्या सीखने गये थे। वहाँ बहुत दिन तक ब्रह्मचारी बन कर रहे और गुरु की बड़ी सेवा की । हमारे साथ पाञ्चाल देश के राजकुमार द्रुपद भी महर्पि अग्निवेश के शिष्य थे। बहुत दिन तक एक ही साथ रहने के कारण हम दोनों से बड़ी मित्रता हो गई। एक दिन द्रपद हमसे कहने लगे : भाई ! हम अपने पिता के बहुत प्यारे हैं। पिता हमें बहुत चाहते हैं। एक न एक दिन हमें राज्य ज़रूर ही मिलेगा। जब हमें राजसिंहासन पाप्त होगा तब राज्य के सारे सुख और ऐश्वर्य हम तुम दोनों मिलकर भोग करेंगे। ___ सारी विद्या और शिक्षा प्राप्त करके द्रपद अपने राज्य को लौट गये । उनकी उस प्रतिज्ञा की याद हमको बनी रही । वह हमें कभी नहीं भूली। कुछ दिन के अनन्तर हमने गौतम की कन्या कृपी के माथ विवाह किया। उससे हमें सूर्य के समान तेजवाला अश्वत्थामा नाम का एक पुत्र हुआ। इस घटना से हम दोनों स्त्री-पुरुष बहुत प्रसन्न हुए। किन्तु दरिद्रता के कारण हम उसका अच्छी तरह लालन-पालन न कर सके। एक बार अश्वत्थामा ने देखा कि किसी धनी आदमी का लड़का दृध पी रहा है। बाल-स्वभाव के कारण उसे भी दूध पीने की इच्छा हुई। वह रोता हुआ हमारे पास आया। यह देख कर हमें बड़ा दुःख -हमारा मन विकल हो उठा। हमने एक ऐसी गाय ढूँढना प्रारम्भ किया जो दध देती हो। पर अभाग्य से हमें कोई ऐसी गाय न मिली। क्या करते. उदास मन घर लौट आये। आकर देखा कि कल बालक पानी में आटा घोल कर अश्वत्थामा की हँसी कर रहे हैं। वे उसे कह रहे हैं-ले यही दूध है, पी ले । अश्वत्थामा उसे दूध समझ कर पीता है और खुशी के मारे नाचा नाचा फिरता है। यह देख सारे बालक अश्वत्थामा की अज्ञानता और हमारी दरिद्रता को धिक्कार धिक्कार कह कर कौतुक करते हैं। पुत्र की ऐसी दुर्दशा देख और बालकों की हँसी की बातें सुनकर हमारे मन में बड़ा दुःख हुआ। दरिद्रता के कारण हमारे साथी ब्राह्मणों ने पहले ही हमें छोड़ दिया था। भूख-प्यास भी हमें बहुत सहन