पृष्ठ:सचित्र महाभारत.djvu/२९४

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२६२ सचित्र महाभारत [ दूसरा खण्ड इस समय वीर-वर अर्जुन ने मंसप्तकों के साथ बहुत देर तक युद्ध करके उन्हें परास्त किया। तब अश्वत्थामा उनसे लड़ने आय और आगे बढ़ने से रोकने लगे। परन्तु अश्वत्थामा की भी उन्होंने एक न चलने दी। उनसे फुरसत पाकर अर्जुन वहाँ पहुँचे जहाँ कुछ देर पहले युधिष्ठिर ने युद्ध किया था। पर वहाँ उन्हें न देख अर्जुन को बड़ा विस्मय हुआ । उन्होंने भीमसेन से पूछा : हे आर्य्य ! धर्मराज कहाँ हैं ? भीम बोले :--भाई ! सूत-पुत्र के शरों से अत्यन्त पीड़ित होकर धर्मराज डेरों में चले गये हैं । हम यहाँ युद्ध करते हैं; तुम शीघ्र ही जाकर उनकी तबीयत का हाल देखो । द्रोण के साथ युद्ध करके भी उन्हें रण-भूमि नहीं छोड़नी पड़ी थी। परन्तु कर्ण के साथ युद्ध करने में, जान पड़ता है, उन्हें भारी चोट आई है; इसी से उन्हें रण से भागना पड़ा है । कहीं उनके प्राण जाने का डर न हो ! भीमसन से यह अशुभ समाचार सुन कर कृष्ण ने अर्जुन का लंकर डेरों की तरफ बड़े वेग से रथ दौड़ाया। वहाँ पहुँच कर वे दोनों वीर रथ से उतर पड़े और अकेले लेटे हुए धर्मगज के पैर छवे । युधिष्ठिर को उन्होंने अच्छी हालत में पाया । इससे उनकी चिन्ता दूर हो गई । रण-स्थल से कृष्णार्जुन को चला आया देख युधिष्ठिर ने समझा कि कर्ण मारे गये। अतएव बहुत प्रसन्न होकर रुंधे हुए कण्ठ से वे कहने लगे :--- हे मधुसूदन ! हे अर्जुन ! कहो तुम अच्छे तो हो ? बिना कोई घाव लगे और बिना किसी तरह की विपद में पड़े जो तुमने कर्ण का संहार किया इससे हम बहुत प्रसन्न हुए। वह सदा ही अपनी सेना के आगे रह कर अपने पक्षवालों की रक्षा और हमारे पक्षवालों का नाश करता था, और दुर्योधन के हितसाधन में सदा ही तत्पर रह कर हम लोगों को बेहद कष्ट देता था । भीष्म, द्रोण और कृप के हाथ से हमारी जो दशा नहीं हुई वह दशा आज कर्ण के हाथ से हुई । इसी से हम उसकी मृत्यु की खबर विशेष करके पूछते हैं । हम बड़ी देर से तुम्हारे आने की राह उत्सुकतापूर्वक देख रहे थे। उत्तर में अर्जुन ने कहा : हे धर्मराज! संसप्तक लोगों के साथ हम युद्र समाप्त न कर पाये थे कि कौरवों की सेना के आगे महावीर अश्वत्थामा हमें दिखाई दिये । उन्होंने हमाग आगे बढ़ना रोकने के लिए बड़ी ही भीषण बाण-वर्षा करके हम पर आक्रमण किया। हमारे ठीक सामने आकर वे हमारे ऊपर ऐसे शेर हाथी पर टूट पडता है। तब गुरु-पुत्र अश्वत्थामा के साथ हमारा घोर युद्ध होने लगा। उन्होंने पहले तो विष के बझे आग के समान जलते हार, तीक्ष्ण बाणों से हमें और वासदेव को बे-तरह पीड़ित किया । परन्तु पीछे से जब हमने उनके सारे अस्त्र-शस्त्रों को व्यर्थ करके उन पर लगातार विकट बाणों की वर्षा प्रारम्भ की, तब हमारे बाणों की मार से कौरव-सेना को अत्यन्त पीड़ित और रुधिर में सराबोर देख वे कर्ण की रथ-सेना में घुस गये । हम उनके पीछे दौड़े। परन्तु राह में भीमसेन ने तुम्हारी हार की खबर सुनाई। इससे तुम्हारे कुशल-समाचार जानने के लिए हम तुम्हारे पास आये हैं। चलो, कर्ण के साथ अब हमारा युद्ध देखो। महाबली कर्ण के द्वारा परास्त किये जाने से युधिष्ठिर को बे-हद मन्ताप हुआ था। इससे उन्हें अब तक जीवित सुन वे अपने आपको न सँभाल सके-वे आपे से बाहर हो गये और अर्जुन पर क्रोध करके कहने लगे :-- __हे अर्जुन ! तुमने बार बार प्रतिज्ञा की है कि तुम सूत-पुत्र को अकेले ही मारोगे । इस समय तुम्हारी वह प्रतिज्ञा कहाँ गई ? कर्ण से डर कर भीमसेन को अकेला छोड़ आज तुम कैसे चले आये ? केवल तुम्हारे ही भरोसे आज तेरह वर्ष से हम राज्य पाने की आशा कर रहे हैं। पर आज