पृष्ठ:सचित्र महाभारत.djvu/१६१

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पहला खण्ड ] अज्ञात वास ___ यह सुन कर सभासद् लोग शीघ्र ही भीमसेन के पास गये और राजा की आज्ञा के अनुसार सब बातें उनसे पूछी । भीमसेन का जैसा वेश था उसके अनुसार दीन भाव से वे राजा के सामने आकर बोले : हम उत्तम रसोइया हैं। हमारा नाम वल्लभ है । कृपा करके आप हमें अपना रसाईदार बना लीजिए। ___ विराट ने कहा :-हे सौम्य ! तुम्हें देखने से मालूम होता है कि तुम कोई मामूली रसोइये नहीं हो। तुम्हारा तंज और बल कह रहा है कि तुम राजा बनने के योग्य हो। भीम ने कहा :-हे विगटेश्वर ! पहले हम गजा युधिष्ठिर के यहाँ नौकर थे। हमारे बनाये हुए भाजनां से वे बड़े प्रसन्न होते थे। इसके सिवा कुश्ती लड़न में भी हम बड़े चतुर हैं। इसलिए हमें विश्वास है कि हम आपको प्रसन्न कर सकेंगे। विगट ने कहा :-वल्लभ ! यद्यपि हम तुम्हें इस काम के योग्य नहीं ससझते तो भी तुम्हारी इच्छा पूर्ण करते हैं। तुमको हम अपना प्रधान रसोइया बनाते हैं। इस तरह गजा के प्यारे बन कर भीम भी मनमाने काम पर नियुक्त हो गये। किसी ने उन पर जग भी सन्देह नहीं किया। - इसके बाद लम्ब और कोमल बालों की चोटी बाँधे और एक मैला कपड़ा पहने हुए काले नत्रोंवाली द्रौपदी, मैरिन्ध्री की तरह, दीन भाव से राजभवन की ओर चली। उसकी अलौकिक सुन्दरता को देवकर नगर-निवासी स्त्री-पुरुपों को बड़ा कौतृहल हुआ। वे एक एक करके द्रौपदी से पूछने लगे: तुम कौन हो, कहाँ जाओगी और क्या चाहती हो ? द्रौपदी ने सबसे कहा : मैं मैरिन्ध्री हूँ। सिङ्गार करने की विद्या मैं बहुत अच्छी जानती हूँ। जो कोई मुझे नौकर ग्ग्वे गा उसका काम मैं जी लगा कर अच्छी तरह करूंगी। ___ महल के ऊपर से विगट की रानी सुदेष्णा इधर उधर देख रही थी। इसी समय दरिद्रों के से कपड़े पहने हुए और अलौकिक म्वरूपवाली द्रौपदी को उन्होंने देखा । सुदेष्णा ने उस पास बुला कर कहा :भद्रे ! तुम कौन हो और क्या चाहती हो ? द्रौपदी ने पहले ही की तरह मैरिन्ध्री का काम पाने की प्रार्थना की । तब गनी ने कहा : हे सुन्दरी ! तुमको अपनी सखी बनाने में हमें बड़ी प्रसन्नता होती है। पर तुम्हारी सुन्दरता को देख कर डर लगता है कि कहीं राजयगने के लोग तुम्हारे लिए चञ्चल होकर कोई अनिष्ट न कर बैठे। द्रौपदी ने कहा :-हे रानी ! मैं महाप्रतापी गन्धर्वो की स्त्री हूँ। इसलिए मेरा अपमान कोई नहीं कर सकता । ऐसा कौन राज-पुरुष है जो यह बात जान कर भी मेरे लिए मन में बुरे विचार ला सके ? इसलिए आप मुझे बे-खटके नौकर रख सकती हैं। मैं पहले यदुकुल में श्रेष्ठ कृष्ण की रानी सत्यभामा और कुरुवंश में महासुन्दरी द्रौपदी के यहाँ नौकर थी। मैं बाल संदारने, उबटन लगाने और तरह तरह के हार गूंथने में बड़ी निपुण हूँ। पर मेरी एक प्रार्थना है। वह यह कि मुझे फंठी चीज़ छने या पैर धोने का काम न करना पड़े। रानी ने-अच्छा-कह कर और उपयुक्त कपड़े तथा गहने देकर द्रौपदी को अपने घर में रख लिया। इसके बाद सहदेव ग्वालों का ऐसा वेश बना और उन्हीं की ऐसी बोली सीख कर विराट के यहाँ आये और राजमहलों से मिली हुई गोशाला के पास खड़े हो गये। उनका तेजस्वी रूप और वह ग्वालों का वेश देख कर राजा बहुत विस्मित हुए । उन्होने उनको बुलाया और पूछा : फा०१८