पृष्ठ:संगीत विशारद.djvu/६४

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  • सङ्गीत विशारद *

६७ - २५-सा रे ग म प ध ध सां | ३१-सा ग ग म प ध ध सां २६-सा रे ग म प ध नि सां | | ३२-सा ग ग म प ध नि सां २७-सा रे ग म प ध नि सां | ३३-सा ग ग म प ध नि सां २८-सा रे ग म प ध नि सां| ३४-सा ग ग म प ध नि सां २६-सा रे ग म प ध नि सां | ३५-सा ग ग म प ध नि सां ३०-सा रे ग म प नि नि सां । ३६-सा ग ग म प नि नि सां उपरोक्त पूर्वार्ध और उत्तरार्ध के मेल से उत्पन्न हुए ३६ थाटों में केवल शुद्ध मध्यम ही लिया गया है। अब अगले ३६ थाट भी इसी तरह तैयार होंगे। फर्क केवल इतना हो जायगा कि शुद्ध मध्यम की जगह उनमें तीव्र मध्यम लग जायगा । इस प्रकार ७२ थाट होजाते हैं। अर्थात दोनों मध्यमों से ३६४२=७२ थाट उत्पन्न होगये। उपरोक्त ७२ प्रकारों के अलावा अन्य कोई नवीन प्रकार इन स्वरों से नहीं बन सकता। एक शंकायहां पर यह शंका होना स्वाभाविक है कि जब थाट सदैव सम्पूर्ण होता है अर्थात् उसमें सातों स्वरों का होना जरूरी है तो क्या कारण है कि थाट नम्बर १ में ग नि वर्जित होगया है, तथा थाट नम्बर ३१ में रे नि वर्जित होगया है, एवं अन्य कुछ थाटों में भी रे व कुछ थाटों में ग वर्जित होगया है ? इसका उत्तर यह है कि पं० व्यंकटमखी के बारहों स्वर हमारे प्रचलित १२ स्वरों के समान नहीं थे। उनमें प्रति सैकिण्ड में होने वाले अांदोलन आधुनिक १२ स्वरों के आंदोलनों से भिन्न थे। व्यंकटमखी ने थाट को सम्पूर्ण बनाने के लिये अपने स्वरों के कुछ और ही नाम रख लिये थे। जैसे—पूर्वार्ध सप्तक में हमारे यहां सा रे रे म रखा गया है उन्होंने वहां इसे सा रा गा मा इस प्रकार नाम दिया है, देखिये: व्यंकटमखी पंडित के कल्पित स्वरों के पूर्वार्धहमारी पूर्वार्ध सप्तक । व्यंकटमखी के कल्पित नाम १-सा रे रे म १-सा रा गा मा २-सा रे ग म २-सा रा गी मा ३-सा रा गू मा ४-सा रे ग म ४-सा री गी मा -सा रे ग ५-सा रू गी मा ग ग ६–सा रू गू मा 쇄