पृष्ठ:संगीत विशारद.djvu/२१०

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  • सङ्गीत विशारद *

२२५ इस प्रकार अमर सङ्गीत की सुखद त्रिवेणी बहाता हुआ यह महान् सङ्गीतज्ञ मृत्यु के नकट भी आ पहुँचा । दिल्ली में ही तानसेन ज्वर से पीड़ित हुए; अन्तिम समय जानकर न्होंने ग्वालियर जाने की इच्छा प्रकट की, परन्तु बादशाह के मोह और स्नेह के कारण तानसेन फरवरी सन् १५८५ ई० में दिल्ली में ही स्वर्गवासी हुए। इच्छानुसार तानसेन का राव ग्वालियर पहुँचा कर फकीर मोहम्मद ग़ोस की कब्र के बराबर समाधी बनादी गई। तानसेन की मृत्यु के पश्चात् उनका कनिष्ठ पुत्र बिलास खां, तानसेन के सङ्गीत को जीवित रखने और उसकी कीर्ति को प्रसारित करने में समर्थ हुआ। बैजूबावरा यह सुप्रसिद्ध गायक तानसेन का मित्र और एक दृष्टि से तानसेन का प्रतिद्वन्दी भी था और अकबर बादशाह के समय (१५५६-१६०५ ई० ) दिल्ली में रहता था। यह उसी काल के प्रसिद्ध गायक गोपाललाल का भी मित्र था। बैजू ने अनेक ध्रुपद बनाने हैं. जिनमें गोपाललाल, तानसेन और बादशाह अकबर का नामोल्लेख किया हुआ मिलता है । विद्यार्थियों को यह भी मालुम होना चाहिये कि 'नायक बैजू' और 'बैजूबावरा' ये दो भिन्न-भिन्न गायक थे और भिन्न-भिन्न कालों में हुए हैं। बैजूबावरा ने कभी बादशाह की नौकरी स्वीकार नहीं की। १६ वीं शताब्दी में अकबर के राज्यकाल में ही यह स्वर्गवासी हो गये। सदारंग-अदारंग ख्याल की बहुतसी चीजों में "सदा रंगीले मौमद सा" ऐसा नाम कई बार देखने में आता है । १८ वीं शताब्दी में न्यामतखां नाम के एक प्रसिद्ध बीनकार हो गये हैं। यह अपनी बनाई हुई चीजों में उस समय के बादशाह मोहम्मद शाह का नाम डाल दिया करते थे। बादशाह को प्रसन्न करने के लिए ही वे ऐसा किया करते थे। न्यामतखां अपना उपनाम 'सदारंगीले' रखकर साथ में बादशाह का नाम जोड़ भी दिया करते थे। 'सदारंगीले' को ही सदारङ्ग भी कहा जाता था। न्यामतखां (सदारङ्ग ) के खान्दान के बारे में बताया जाता है कि ये तानसेन की पुत्री के खान्दान में दसवे व्यक्ति थे। इनके पिता का नाम लालसानीखां और बाबा का नाम खुशालखां था । यद्यपि ख्याल रचना का कार्य सर्व प्रथम अमीर खुसरो ने शुरू किया था, . किन्तु उस समय ख्याल-रचना विशेष लोकप्रिय न हो सकी। इसके बाद सुल्तानहुसैन शर्की, बाजबहादुर, चंचलसेन, चांदखां, सूरजखां ने भी यही कार्य करने की चेष्टा की, किन्तु उन्हें भी विशेष सफलता न मिल सकी। न्यामतखां ने उनकी इन असफलताओं का कारण ढूढ़ निकाला। इन्होंने अनुभव किया कि जब तक कविता में बादशाह का नाम न डाला जायेगा, तब तक वे अच्छी तरह प्रचलित नहीं हो सकेंगी। साथ ही इन्हें रूठे हुए बादशाह को भी खुश करना था, क्योंकि वेश्याओं को तालीम न देने पर एक बार बादशाह इनसे नाराज़ हो गये थे, अतः वे उपनाम "सदारंगीले” के साथ बादशाह का नाम तो डालने लगे, किन्तु इसकी खबर बादशाह को न होने दी कि यह कविता किसकी बनाई हुई है और सदारङ्ग कौन है। इस प्रकार बहुतसी कवितायें न्यामतखां ने तैयार