पृष्ठ:संगीत विशारद.djvu/२०६

यह पृष्ठ अभी शोधित नहीं है।
  • सङ्गीत विशारद *

२२१ दिल्ली आकर खुसरो ने सङ्गीत कला में अपूर्व क्रांति पैदा की। इसमें दक्षिण के शुद्ध स्वर सप्तक की योजना कर उसे प्रचलित किया । लोक रुचि के अनुकूल नये-नये रागों की रचना की । राग वर्गीकरण का एक नवीन प्रकार राग में ग्रहीत स्वरों से निकाला । इसने रागों में गाने योग्य तद्देशीय भाषा में नये-नये गीतों की रचना की। यही गीत आगे चलकर ‘ख्याल' के नाम से प्रसिद्ध हुए, अतः ख्याल का जन्म दाता भी खुसरो को मानते हैं । इसके पश्चात् अमीर खुसरो ने वाद्ययन्त्रों में भी काफी परिवर्तन किया । दक्षिणी वीणा में चार तार की बजाय तीनतार कर दिये, तारों का क्रम उलट कर उसमें अचल परदे लगा दिये । इसके अतिरिक्त द्रुतलय में बजाने को आसानी पैदा करने के लिये इसकी गते स्थिर की और उन्हें ताल में निबद्ध किया। प्राचीन वीणा की अपेक्षा यह परिवर्तित वाद्य अधिक लोकप्रिय होगया। इस वाद्य में तीन तार होने के कारण इसका नाम सहतार (सितार) फारसो नाम रक्खा । वर्तमान 'सितार' इसी वाद्य का रूप कहना चाहिये । अमीर खुसरो ने, 'सङ्गीत' विषय पर फ़ारसी की कई पुस्तकें भी लिखीं। भारत और फ़ारस के सङ्गीत के मिश्रण से कई राग भी ईजाद किये, जिनमें-साजगिरी, उश्शाक़, जिला, सरपरदा आदि स्मरणीय हैं। खुसरो ने गाने की एक नवीन प्रणाली को भी जन्म दिया जिसे क़व्वाली कहते है। इस प्रकार सङ्गीत के क्षेत्र में अमिट कार्य करके लगभग ७२ वर्ष की आयु में अमीर खुसरो स्वर्गवासी होगये । गोपाल नायक अलाउद्दीन खिलजी ने सन्. १२६४ ई० में देवगिरी (दक्षिण). पर चढ़ाई की थी, उस समय वहां रामदेव यादव नामक राजा राज्य करता था। इसी राजा के आश्रय में गोपाल नायक दरबारी गायक रहता था। इसी समय गोपाल नायक और अमीर खुसरो की सङ्गीत प्रतियोगिता हुई। खुसरो के छल और चातुर्य द्वारा गोपाल नायक को पराजित होना पड़ा और उसने अपनी हार स्वीकार करली। किन्तु अमीर खुसरो हृदय से इसकी विद्वता का लोहा मानता था, अतः दिल्ली वापिस आते हुए उसने नायक को भी साथ ले लिया। दिल्ली में गोपाल नायक को गायक के रूप में पूर्ण सम्मान प्राप्त हुआ। गोपाल नायक के विषय में एक किंवदन्ती अबतक चली आ रही है कि, जब कभी यह दिल्ली से बाहर जाते थे, तब अपनी गाड़ी के बैलों के गले में समयानुसार, रागवाचक ध्वनि पैदा करने वाले घन्टे बांध दिया करते थे। चतुर कल्लिनाथ ने भी 'रत्नाकर' ग्रंथ के तालाध्याय की टीका में ताल व्याख्या के अन्तर्गत गोपाल नायक के नाम का उल्लेख किया है, इससे प्रमाणित होता है कि उस समय के सङ्गीत विद्वानों में गोपाल नायक का काफी 1 सम्मान था। इतिहास के संकेतानुसार गोपाल नायक सन् १२६४ और १२६५ ई० के बीच दिल्ली पहुँचे । उस समय के उपलब्ध संस्कृत ग्रंथों में ध्रुपद नामक प्रबन्ध का उल्लेख नहीं मिलता, इससे सिद्ध होता है कि गोपाल नायक ध्रुपद नहीं गाते थे। उनके समय में सम्भवतः अन्य प्रबन्ध प्रचलित थे, जो संस्कृत, तामिल, तेलगू आदि भाषाओं में थे। गोपाल नायक जाति के ब्राह्मण थे। देवगिरी के पश्चात् आपके जीवन का शेष भाग दिल्ली में ही व्यतीत हुआ और वहीं इनकी मृत्यु भी हो गई।