पृष्ठ:संगीत-परिचय भाग १.djvu/३९

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अन्तरा


प — प प
खो —ज त

प — प प
स र व अ

गं — गं रें
सा — ध सं

ग — ग ग
मा — या —


नी — नी नी
खो — ज त

नी — सं —
र्थ — बि —

— रें रें सं
ग — — प

प — नी नी
र च ब न


सं सं सं सं
ब हु प र

प नी सं रें
चा — आ —

प नी सं रें
र म ग त

पनी संरें संनी धप
धा आ — —


नी रें सं —
का —रे —

सं नी ध प
रे — ऐ —

सं नी ध प
पा इ ये —

म — ग —
रे — ऐ —


राग बिलावल

(ताल तीन मात्रा १६)

शब्द गुरु नानक(श्री गुरू ग्रन्थसाहब)

ऊच अपार बेअंत स्वामी।
कौन जाणे गुण तेरे ॥
गावते उधरे सुनते उधरे ।
बिनसे पाप घनेरे ॥
पसू परेत मुगध को तारे ।
पाहन पार उतारे ॥
'नानक दास', तेरी सरनाई।
सदा सदा बलिहारे ॥