पृष्ठ:संक्षिप्त रामस्वयंवर.djvu/६५

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रामस्वयंबर ४६ (दोहा) चढ़ि नालकी नरेस तह, संजुत चारि कुमार। रंगमहल गमनत भये, संग सविव सरदार ॥२६॥ विद्यारंभ। (सोरठा) सुदिवस सुखद सोधाइ, भेज्यो भवन वशिष्ठ के। विद्यारंभ कराइ, लगे परीक्षा लेन नित ॥ २६३ ॥ (छंद चौवोला) थारेही दिन में सव अक्षर अक्षर प्रभु को आये। भाषाबंध प्रवध छंदजुत चारहुं वधु सोहाये ॥ जान पढ़ें गुरु भवन सुवन सब सो नित पितहि सुनावें। सुनत सराहत सफल समाजन जननि जनक सुख पावै ॥२६॥ एक दिवस इक गुनी अपूरव राजसभा महं आयो। लहि नप शासन सामग्री निज कौतुक की फैलायो॥ देखन को धाये नर नारी सोर भयो रनिवासा।। राजकुमार तुरत चलि आये देखन हेतु तमासा ॥ २६५॥ बैठे पिता अंक रधुनंदन भरत सत्रुहन जानू । लपन कूदि चढ़ि गये कंध मह मनहु मेरु पर भानू ।। करनाटकी हाटकी सुंदर समा तुरंत बनाई।, ढोल बजाय वखानि भूप कह दिय आवर्त लगाई ॥२६६॥ पुनि अति मंजुल विविध भांति के लग्यो बजावन वाजे ।