पृष्ठ:संक्षिप्त रामस्वयंवर.djvu/४३

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रामस्वयंवर ।- __ . (दोहा) कनककसिपु कनकाक्ष को, हन्यो नृसिंह वराह । कुंभकर्ण रावण हत्या, है प्रभु कोशल-नाह ॥१४॥ दंतवक सिसुपाल को, हन्यो देवकी लाल । विगत साप हरि पारपद, बसे विकुठ विसाल ॥१४५|| राम-जन्म • जव ते नारायण कियो, नृप घर गर्म निवास । तव ते कोसल नगर मह, नित नव होत हुलास ॥१४॥ जैसे तैसे वीतिगे, कलपत द्वादस मास । 'आई बहुरि घसंत ऋतु, बिमल भई दस आस ॥१४॥ (कवित्त) । ..विमल वसंत ऋतु तामें मधु मास सुभ, स्वच्छ सित पन्छ नौमी तिथि ससिबार हैं । अभिजित विजय प्रदाता है मुहरत सो, सूल,जोग कौलौ नामकरण उदार हैं ॥ रघुराज वेला मध्य दिवस को आई अवै, अति मन माई सुखदाई निर्विकार हैं । सगुन सोहावन अनेक वहाँ होन .लागे, परै लागे खलन परावन अपार हैं१४८॥ . . . . कुंवर जनम जानि अवसर आनंद को, माच्यो खैरभैर राज मंदिर में मारी है ॥ अति अतुराई एक सखी चलि आई तह; चैटे रघुवंशी राजवंशी दरवारी है। भूपमनि कान में