पृष्ठ:संक्षिप्त रामस्वयंवर.djvu/१६०

यह पृष्ठ अभी शोधित नहीं है।

१४४ रामस्वयंवर। . (चौपाई ) .. . करत वराती हास विलामा । आये सकल सुखद जनवासा ।। कनककलस कोपर चड़ थारी। कूड कुंभ मंजूपा झारी ॥ भरि भरि भोजन पान प्रकारा। सुधा सरिस पकवान अपारा॥ जथा लोग जस जौन बराती ।यति उत्तम नप यह सब जाती|| सतानंद अरु सचिव लिवाई । कोसलगालहि नजर कराई ।। तिन आगे चिउरा दधि राखे । बोले वचन जनक जस भाखे । जोरि पानि जुगनावत सीसा । जनक कह्यो सुनु अवध-अधीसा दधि चिउरा उपहार हमारा | लेहु कृपा करि अवध-भुआरा॥ (दोहा) भोजन काल विचारिकै उठन चहौ महिपाल। 'हल्ला परयो वरात में यकवारहि तिहि काल ८५५॥ 'रामलपन लै संग में दसरथ-दरसन हेत। आवत विस्वामित्र अव तुरत गाधिकुलकेत ॥ ५६॥ (चौपाई ) भई भीर दसरथ के द्वारे । निकसत जन करिजोर निझारे । भरत सत्रुहन अति अतुराई । आय गए सुनि राम अवाई ॥ देखहि रघुकुल राजकुमारा राम दरस लालसा अपारा गुरु वशिष्ठ अरु कौसलपाला सहित निपाद भरत रिपुसोला। उतले आये गाधि कुमारे । सहित जुगल दसरत्य-दुलारे ॥ स्तते करि वशिष्ठ मुनि आगे । राजसमाज गई अनुरागे । विश्वामित्र वशिष्टहि देखी। कियो प्रणाम महामुद लेखी ।