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जीवत पै कि मरे पहँ जैहै।
कौन पिताहि तिलोदक दैहै ॥२७३॥
अगद हाथ गहै तरु जोई।
जात तहीं तिल सौ कटि सोई॥
पर्वत पुज जिते उन मेले।
फूल के तूल लै बानन झेले ॥२७४॥
वानन वेधि रही सब देही।
बानर ते जो भये अब सेही॥
भूतल ते सर सारि उड़ायो॥
खेल के कटुक कौ फल पायो ॥२७५॥
सोहत है अध ऊरध ऐसे।
होत बटा नट को नभ जैसे॥
जान कहूँ न इतै उत पावै॥
गोवल चित्त दसौं दिसि धावै ॥२७६॥
बोल घट्यो सो भयो सुरभगी।
है गयौ अंग त्रिसंकु को संगी॥
हा रघुनायक हौ जन तेरो।
रच्छहु,गर्व गयो सब मेरो ॥२७७॥
दीन सुनी जन की जब बानी।
जी करुना लव बानन आनी॥


(१) सेही = स्याही नामक वन-जतु, शल्लको।