पृष्ठ:संक्षिप्त रामचंद्रिका.djvu/२०९

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जी उठत उक्त ज्यों उदधिन द।
त्यौं भरत भये सुनि रामचद॥४॥
ज्या सोइ रहत सब सूरहीन।
अति हैृ अचेत यद्यपि प्रवीन॥
ज्यौं उवत उठत हँसि करत भोग।
त्यौ रामचद्र सुनि अवध लोग॥५॥

[मालिनी छद]

जहँ तहँ गज गाजै दुदुभी दीह बाजै।
बहुवरण पताका स्यदनाश्वादि राजै॥
भरत सकल सेना मध्य यौं वेष कीने।
सुरपति जनु आये मेघमालानि लीने॥६॥
सकल नगरबासी भिन्न सेनानि 'साजै।
रथ सुगज पताका झुडझुडानि राजै॥
थल थल सब शोभै शुभ्र शोभानि छायी।
रघुपति सुनि मानों औधि सी आज आयी॥७॥

[चामर छद]

यत्र तत्र दास ईस व्योम तै बिलोकहीं।
वानरालि रीछराजि दृष्टि सृष्टि रोकहीं॥
ज्यौ चकोर मेघ-ओघ मध्य च द्र लेखहीं।
भानु के समान जान त्यो विमान देखहीं॥८॥



१) उदधिनद = चंद्रमा।