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श्यामास्वप्न

उनकी माता थोड़े थोड़े धान्य के पलटे बेचने लगी . माता पुत्र और पिता पुत्र का प्रेम जाता रहा . बड़े बड़े धनाढ्य लोगों की स्त्रियाँ जिनके पवित्र चूंघट कभी बेमर्यादा किसी के सन्मुख नहीं उघरे और जिन्हें आर्यावर्त की सुचाल ने अभी तक घर के भीतर रक्खा था अपने पुत्रों के साथ बाहर निकल पथिकों के सामने रो रो और आँचर पसार पसार एक मुठी दाने के लिए करुणा करने लगी. जब संसार की ऐसी गति थी तो हमारे पूर्व पुरुषों की कौन गति रही होगी ईश्वर जानै . मैं न जाने किस योनि में तब तक थी . जब वे लोग राजदुर्ग में आए किसी भाँति अपना निर्वाह करने लगे. ब्राह्मण की सीधी साधी वृत्ति से जीविका चलती थी . किसी को विवाह का मुहुर्त धरा-कहीं सत्यनारायण कहा-कहीं रुद्रा- भिषेक कराया-कहीं पिराडदान दिलाया और कहीं पोथी पुरान कहा द्वादशी का सीधा लेते लेते दिन बीते इसी प्रकार जीविका कुछ दिन चली . मेरे पितामह पितामह के वंश के हंस थे . उनका नाम अवधेश था . उनके दो विवाह हुए. उनकी दोनों पत्नी अर्थात् मेरी पितामहीं बड़ी कुलीना थीं. एक का नाम कौशल्या और दूसरी का अहल्या था. अवधेशजी को कौशल्या से एक पुत्र हुवा . उसका सब सिष्टों ने मिल कर इष्ट साध वसिष्ठ सा वलिष्ठ नाम धरा . ये मेरे पूज्यपाद परमोदार परम सौजन्य-सागर सब गुनों के आगर जनक थे . कुछ काल वीतने पर कौशल्या सुरपुर सिधारी, उस समय मेरे पिता कुछ बहुत बड़े नहीं थे , शोकसागर में डूबे, पर देव से किसका बल चलता है . थोड़े ही दिनों के उपरांत भगवान् चक्रधर की दया से अहल्या को एक बालक और एक बालिका हुईं . बालक का नाम नारद और बाला का गोमती पड़ा. यह वही गोमती मेरे पीछे बैठी है. इस अभागिन के (की) कुंडली में ऐसे बाल वैधव्य जोग पड़े थे कि यह बिचारी अपना सुहाग खो बैठी. इसकी कथा कहाँ तक कहूँगी. अभागिनियों की भी कहानी कभी सुहावनी हुई है ? मेरे पिता जब युवा हुए अवधेशजी ने राव चाव से उनका विवाह शारंग- +