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श्यामास्वप्न

आम की मंजरी सभों को सकाम करती है . वक्र और अधखुले पलास अपने पलासों के गर्व में टेढ़े हो रहे हैं . मालती की लती-चमेली-पाटल-चंपा-इत्यादि सब के सब अपने-अपने राव चाव में मगन हो रहे हैं-पर्वत की अनूपम शोभा कही नहीं जाती . सरिता उसी की नव वधू सी हो उसकी गोद से निकलकर और भी प्रमोद को बढ़ाती है.पर्वत की कंदरा सिंह के नाद से प्रतिध्वनित हो रही है--इधर उस नाद को सुन गवय और गज भी भीत होकर पलीत के (की) भांति चिक्कार मार कर भागते हैं-हरिन अप प्यारी हरिणी के साथ-[हा हरिणनयनि ! ] कूदते जाते हैं-मयूरों के जूथ का वरूथ उड़ा जाता है-बादल छा गए-चंद्रमा छिप गए-पर बीच-बीच में उधर जाने से कभी-कभी प्रकाश भी करते हैं-

कबहुँ जामिनी होत जुन्हैया डसि उलटी हो जात.
मंत्र न फुरत तंत्र नहिं लागत प्रीति सिरानी जात-

यह सूरदास का भजन स्मरण होता है इस प्रकार क्षण भर हेमंत में भी पावस का समाज हो गया था पर अंत को अकाल ही के मेघ तो थे क्षण में प्रवात से विथुर गए आकाश खुल गया ,

यह हेमंत का समय था, गुलाब से करवाली उषाने चित्रोतला के उर से अंधकार के मेघ दूर किये और उदय होते हुये भानु की किरणों का प्रतिबिंब लहरों में लहराने लगा . इस पुराने ग्राम के एक ओर नदी के तीर से पलास, आम, ताल, और खजूर के महाबन पर्यंत प्रचुर शालि की भीत अपने सुनहले सिर कपाती थी-दूसरे (री) ओर संपन्न गोचारण भूमि वज्रांग के गाय गोरुओं से आच्छादित थी . परंतु जब सूर्य का प्रकाश ऐसे मनोहर दृश्य पर ग्राम, मंदिर, और महलों पर फैला उस डायन के भुइंहरे का कारागार अंधेरा ही रहा उस भयानक स्थान के इ तभागे बंदियों में से एक युवा को छोड़ जो विद्यार्थी के रूप में था