पृष्ठ:श्यामास्वप्न.djvu/२१२

यह पृष्ठ जाँच लिया गया है।
१७२
श्यामास्वप्न

जौं गजराज सरीखे महाबली खीचै सबै गहि डोर पहारहिं।
तौहू हटै न चलै कोउ भाँतिन पौन को वेग कहा गिरि टारहिं॥६१॥
भ्रमरी हग श्यामा सरोजमुखी बहियां गहती न अजो हमरी।
हमरी कहु कौन दशा सजनी जग होती त्रिशंकहु सो कम री॥
कमरी सम झांझर देह भई दुवरी सुवरी विरहातमरी।
तमरी अब कौन विलोचन चंद मिटै जगमोहन को भ्रमरी॥६२॥
श्रम री इतनो करि हाय थके इक साधन ना शिव सों कमरी।
कमरी भई प्रीत की रीत सबै मनसो न गयो अजहू भ्रम री॥
भ्रमरी सम भूलि भ्रमे नलनी चहुँ पायो पराग मधू सम री।
समरी दमरी लौ दियो बदलो जगमोहन व्यर्थ कियो श्रम री॥६३॥

दोहा


दिपति दिवाली दीप दुख दारत दुःसह प्रान।
बिनु श्यामा इत द्यौस निशि लगि दमार तन जान॥६४॥
राम मनावत दिन गए याही दिन की बात।
यही सोच मन रहि गयो हाथ मीजि पछितात॥६५॥
पुनि न करी मेरी सुरति सुनि न खबर मम कान।
रह्यौ कराहि कराहि जिय विकल मीन लो प्रान॥६६॥

सवैया


श्राज लौ रोवत गावत सोबत जोहत बीते कहूं दिन मेरे।
पै अब कैसी करों सुनिये जिय ढाढ़स ना अकुलात घनेरे॥
पाती लिखी किहि कारन नाहिं सु छाती जरै विरहा तन घेरे।
हाय दई अनहोनी करी जगमोहन सों सब हाथ है तेरे॥६७॥
आज प्रभात ही बात तिहारियै प्राय गई जिय सोचत तोही।
त्यौं जगमोहन ध्यानहिं धार रहें भरतौ समहू जड़ जोही॥
मूंंदत नैन गए तन चैन सो लाय रह्यौ मन मूरति ओही।
और कों का अखियाँ ए लखैं चखि अमृत छांछ धौं क्यौं इन्हें सोही॥६८॥