पृष्ठ:श्यामास्वप्न.djvu/१३

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ही जैसे यह काव्य रचा गया । 'श्यामास्वप्न' में श्यामा जब इस अनमेल वर्ण-सम्बंध की ओर श्यामसुंदर का ध्यान आकृष्ट करती है तब श्यामसुंदर उसे समझाते हैं :

वर्गों के सम्बंध में कुछ दोष नहीं, देवयानी और ययाति के पावन चरित अद्यापि भूमंडल को पवित्र करते हैं। (पृ० ९१ )

देवयानी ब्राह्मणकुमारी थी और ययाति क्षत्रिय नरेश । जब इनके विवाह शास्त्र-विहित हैं तो श्यामा-श्यामसुंदर का प्रेम अपराध कैसे हो सकताहै-मानों इसी तर्क को उपस्थित करने के लिए इस काव्य की रचना हुई।'देवयानी' के पश्चात् उसी वर्ष प्रस्तुत ग्रंथ 'श्यामास्वप्न' और 'श्यामा-विनय' की रचना जाड़ों में हुई और अगले वर्ष १८८६ में 'श्यामा सरोजनी' की रचना हुई जिसमें सब मिलाकर २०४ छंद हैं । इन सभी रचनाओं को पढ़कर ऐसा जान पड़ता है कि कवि ने १८८४ के आस-पास किसी ब्राह्मणकुमारी से सचमुच ही प्रेम किया था और उसी प्रेम के उल्लास और निराशा में एक-दो वर्ष में ही चार-चार उत्कृष्ट ग्रंथों की रचना की। इन सभी रचनाओं में आप बीती अनुभवों की व्यंजना हुई जान पड़ती है। 'श्यामा सरोजनी' के तीन सवैयों में कुछ इसी प्रकार की ध्वनि सुनाई पड़ती है :

उत श्यामालता रचि के पहिले उलही तन पादप में जो रही ।
सिगरो जेहि भाव समर्पन में करि तर्पन इंद्रिन केर सही ॥
तब फूली फली नव मल्लिका सी जगमोहन के उर माल सही।
मुरझी उरझी जु रही सुरझी अजहूँ नहिं हाय सो कंठ गही

"श्यामालता' की रचना के समय सम्भवतः प्रेम का विकास हो रहा था । आगे का सवैया देखिए:

सहि कै सब देश के हाय कलेश हू जो तन रोग के पाले परे ।
दुखदायक पीर शरीर रह्यो बन देखे बिदेश बिहाले परे ॥