यह पृष्ठ अभी शोधित नहीं है।

उस ( ३८६ ) सुनते शशांक को तंद्रा सी आ गई, उनकी आँखें झपकने लगीं। उन्होंने क्षीण स्वर से कहा "रमापति-नहीं, नहीं -मालती-मैं तो देखता हूँ कि मेरे जीवन का अंत---अब----” । "महाराज ! यह क्या कहते हैं ? तो फिर मेरे जीवन का भी आज यहीं अंत होगा”। मालती फिर विलाप करने लगी। सम्राट फिर मुञ्छित से हो गए। थोड़ी देर में आँख खोलकर बोले "चित्रा- नरसिंह-बड़ी प्यास-जल-"। मालती सम्राट को उस दशा में छोड़ कहीं जाना नहीं चाहती थी। पास में कहीं पीने योग्य जल मिलना भी कठिन था। बालू के मैदान में समुद्र के खारी जल के अतिरिक्त और कुछ नहीं दिखाई देता था। शशांक को प्यास से व्याकुल देख मालती बड़ी चिंता में पड़ गई। अंत में “अच्छा मैं जल लाने जाती हूँ' कहकर वह एक ओर गई। परमेश्वर परमभट्टारक महाराजाधिराज शशांक- नरेंद्रगुप्त तपती बालू में प्यास से तलफते अकेले पड़े रहे ! इतने में वृक्ष की एक शाखा पर सवार वज्राचार्य चक्रसेन सम्राट के सामने आ खड़े हुए और पुकारने लगे “महाराज-महाराज शशांक !" सम्राट ने अाँखें खोलकर जल मुँह में डालने का संकेत किया ! वृद्ध वज्राचार्य बोले “महाराज ! अदृष्टचक्र पूरा हुआ" वृद्ध आर्य चट एक बूटी का रस शशांक के मुँह में डाल और घावों पर लगाते लगाते बोले "महाराज ! वह बोधिसत्व नागार्जुन का लटका यह कभी व्यर्थ नहीं हो सकता"। औषध मुँह में पड़ते ही सम्राट का शैथिल्य हट गया, पीड़ा में भी बहुत कमी हो गई। वे सँभल कर बोले “प्रभो ! यह आपने क्या. किया ? मुझे अब और क्या दिखाना चाहते हैं ? हर्षवर्द्धन की कामना तो पूरी हुई।