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सत्रहवाँ परिच्छेद ऋण परिशोध का अंतिम प्रयत्न शशांक मगध लौट आए। सोन के किनारे सैन्यभीति और मंडला में वसुमित्र और मावधवा उनके साथ मिले; भास्करवर्मा, माधवगुप्त और हर्षवर्धन तीनों ने मिलकर उन्हें रोकने का उद्योग किया; पर मंडलादुर्ग के सामने उनकी सेना बार बार पराजित हुई। माधवगुप्त तीरभुक्ति की ओर भागे, भास्करवा ने कर्णसुवर्ण में जाकर आश्रय लिया। शशीक ने कर्णसुवर्ण घेरने का संकल्प किया। मावा और रविगुप्त जिस समय कर्णसुवर्ण में घिरे हुए थे उसी समय एक तरुण सैनिक अपनी इच्छा से शत्रु के शिविर को पार करके मंडला और रोहिताश्व से सहायता भेजवाने के लिए गया था। वह तरुण सैनिक इस समय शशांक का बड़ा प्रियपात्र हो रहा है। कर्णसुवर्ण पर चढ़ाई करते समय सम्राट ने उसे अपना शरीररक्षी सेना में रखा। सैनिक का नाम है रमापति । रमापति युद्ध के समय कभी सम्राट के पास से अलग नहीं होता था और महाबलाध्यक्ष, अनंतवर्मा के समान सदा अपने प्राणों को हथेली पर लिए रहता था। रमापति देखने में बड़ा ही सुंदर था। उसका रंग कुंदन सा था देह गठीली और कोमल थी, उसमें कर्कशता का लेश नहीं था। उसके लंबे लंबे काले धुबराले बाल सदा पीठ कधा पर उहराया करते थे। वह जिस समय उन बालों के ऊपर रंगविरंग का चीरा बाँपता था