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(३७२ फिर मिलने की उन्हें बड़ी इच्छा हुई । बंधुगुप्त की मृत्यु के पीछे फिर वज्राचार्य शक्रसेन दिखाई नहीं पड़े थे। शशौक ने उन्हें कपोतिक महाविहार का आधिपत्य देना चाहा था, पर उन्होंने स्वीकार नहीं किया था । सम्राट उनके दर्शन के लिए व्यग्र हो रहे थे। अकस्मात् एक दिन सबेरे वृद्ध वज्राचार्य एक वृक्ष की शाखा को दोनों जाँघों के बाच से निकाले प्रतिष्ठानदुर्ग की ओर आ निकले। शशांक उस समय कान्यकुब्ज की ओर यात्रा करने की तैयारी में थे। उन्होंने दुर्ग के फाटक पर वज्राचार्य को देख चकित होकर पूछा “आप कब आए ? मैं तो इधर कई दिनों से आपकी खोज में हूँ"। वज्राचार्य ने हँसते हँसते कहा "महाराज ! आपने स्मरण किया तभी तो चला आ रहा हूँ"! "आपने कैसे जाना ?" "गणना द्वारा । महाराज ! इस समय की तैयारी रोक दीजिए। आप कान्यकुब्ज न जा सकेंगे । आपको बहुत शीघ्र पूर्व की ओर जाना पड़ेगा। "आप क्या कहते हैं मैंने नहीं समझा। "महाराज ! जो कुछ मैं कहता हूँ उसे मैं ही अच्छी तरह नहीं समझता, आपसे क्या स्ताऊँ-?" "इस समय मैं बड़े संकट में पड़ा हूँ, इसीसे इधर कई दिनों से दिनरात आपका स्मरण करता हूँ"। "महाराज ! बाहरी शत्रु तो आपका बाल बाँका नहीं कर सकता सम्मुख युद्ध में हर्षवर्द्धन कभी आपको परास्त न कर सकेंगे। "पर मैं भी ली हर्षबर्द्धन को एस्त नहीं कर सकता हूँ"। वृद्ध वृक्ष की शाखा दूर फेंक प्रतिष्ठानदुर्ग के पत्थर जड़े आँगन में