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( ३२८) भी कुछ नहीं बिगड़ा है । शशांक का हृदय बहुत उदार है, तुम्हें किसी बात का भय नहीं । माधव ! शशांक आ रहे हैं, मैं उनके सामने नहीं होना चाहता । इससे आज ही या तो प्रतिष्ठान दुर्ग पर अधिकार करूँगा अथवा संध्या होते होते तक्षदत्त के वंश का लोप करूँगा। तुम समुद्रगुप्त के वंशधर हो, सारा वैर विरोध भूलकर यह गरुड़ध्वज हाथ में लो और आगे बढ़ो। संध्या के पहले ही दुर्ग पर चंद्रकेतु के स्थान पर अपना गरुड़ध्वज स्थापित करो। यदि ऐसा करोगे तो मगधवासी तुम्हारा सारा अपराध भूल जायेंगे'। रक्षकों से घिरे हुए युवक ने जब कोई उत्तर न दिया तब पहला युवक फिर कड़ककर बाला "माधव ! अभी तुम्हारा भ्रम दूर नहीं हुआ । अच्छी बात है, तुम शिविर में बंदी रहो, मैं ही जाकर प्रतिष्ठान दुर्ग पर अधिकार करता हूँ"। सेनादल दोनों युवकों को बंदी करके अन्यत्र ले गया। पहले युवक ने आसन से उठकर एक परिचारक से वम लाने के लिए कहा। वर्म लाया गया। उसे धारण करते करते उसने कहा "नायकों को यहाँ बुलाओ" इतने में एक सैनिक ने आकर निवेदन किया कि चरणाद्रिगढ़ से कुछ संवाद लेकर एक अश्वारोही आया है। युवक शिरस्त्राण को हाथ में लिए हुए बोला "उसे यहीं ले आओ"। सैनिक जाकर एक और वावृत योद्धा को साथ लिए आया । उस योद्धा ने आते ही कहा "मैं परसों संध्या को चरणाद्रिगढ़ से चला हूँ। उस समय सम्राट वाराणसी से चलकर वहाँ पहुँच चुके थे। कल सबेरे फिर वहाँ से चले होंगे। आज तीसरे पहर या संध्या को यहाँ पहुँच जायगे"। युवक ने शिरस्त्राण को सिर पर रखकर कहा “अच्छी बात है, तुम जाकर विश्राम करो"। सैनिक अभिवादन करके चला गया । देखते देखते सैकड़ों सेनानायकों ने शिविर के घेरे में आकर युवक को अभिवादन किया । युवक ने भी तलवार उठाकर सबके अभिवादन