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( ३२४) हरि -महाराजाधिराज ! दूत का अपराध क्षमा हो । इस समय वाराणसीभुक्ति की सारी सेना विद्रोही होकर चरणाद्रि की सेना के साथ मिल गई है और नरसिंह नाम के एक व्यक्ति को सेनापति बनाकर उसने प्रतिष्ठान पर आक्रमण कर दिया है। शशांक-नरसिंह ! नरसिंह कौन है ? हरि०. -यह तो मैं नहीं कह सकता। पर वह महानायक नरसिंह- दत्त नहीं हो सकता। तक्षदत्त का पुत्र कभी विद्रोही नहीं हो सकता। शशांक-संवाद लेकर कौन आया है ? हरि०-विद्रोही सेना ने एक अश्वारोही को दूत बनाकर महाराजा- धिराज के पास भेजा है ।। शशांक-महानायक ! उसे यहाँ बुलवाइए। वृद्ध महानायक कहाँ हैं ? हरि -यशोधवलदेव तो इस समय पाटलिपुत्र में नहीं हैं । पर महाराजाधिराज ! यहाँ गंगाद्वार पर मंत्रणा होना ठीक है ? शशांक-क्या हानि है ? पिता जी के समय में गंगाद्वार पर कई बार मंत्रणा हुई थी। हरिगुप्त दंडधर को दूत को बुलाने के लिए भेज आप सीढ़ी पर बैठ गए। सम्राट् ने अनंतवर्मा से पूछा “अनंत ! यह नरसिंह कौन है ?" "कुछ समझ में नहीं आता ।" "और भी कभी यह नाम सुना था ?" "महाराजाधिराज ! चित्रा के भाई नरसिंह को छोड़ मैं और किसी नरसिंह को तो नहीं जानता।" इतने में माधववर्मा, वीरेंद्रसिंह, दंडधर और वर्मधारी सैनिक गंगाद्वार से निकलकर आए । सैनिक सम्राट और नायकों का यथारीति ,