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अाठवाँ परिच्छेद विग्रह और विद्रोह सिंहासनच्युत होकर महाकुमार. माधवगुप्त कहाँ चले गए पाटलिपुत्र में कोई नहीं जानता। कुछ लोग कहते थे कि हंसवेग के साथ थानेश्वर चले गए। शशांक ने अपने छोटे भाई को हूँढ़ने के लिए चारों ओर दूत भेजे, पर उनका कहीं पता न लगा । बंधुगुप्त के मारे जाने के पीछे यशोधवलदेव दिन दिन अशक्त होते गए, यहाँ तक कि वे उठकर चल फिर भी नहीं सकते थे। अपना अंतकाल समीप जान वृद्ध महानायक ने सेठ की कन्या यूथिका और अनंत की बहिन गंगादेवो का विवाह कर देने का अनुरोध सम्राट् से किया । शुभ मुहूर्त में वसुमित्र के साथ यूथिका का, माधव वर्मा के साथ गंगा का और वीरेंद्रसिंह के साथ तरला का विवाह हो गया। शशांक ने लतिका के विवाह के विषय में भी पूछा, पर वृद्ध महानायक ने कोई उत्तर न दिया । विवाहोत्सव होजाने पर एक दिन सम्राट् गंगाद्वार के घाट पर बैठे थे। कुछ दूर पर द्वार के पास महाप्रतीहार विनयसेन और महानायक अनंतवा खड्ग लिये खड़े थे । ये लोग सदा सम्राट के पास रहते थे। भागीरथी के शांत जलसमूह के ऊपर चाँदनी की शुभ्रधारा पड़ रही थी। सम्राट एक टक उसी ओर ताक रहे थे। वे मन ही मन सोच रहे थे कि इसी जलसमूह के नीचे बालुका कणों के बीच कहीं चित्रा छिपी होगी। एक बार भी उसे यदि देख पाते ! उसकी श्वेत ठठरी