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(३१६) यशो०- यशो -वह तो वाण लगने से घायल हुआ था, तुझे इतना रक्त कहाँ से मिला ? बंधु०-महानायक ! मैंने उनके हाथ पैर की नसें काट दी थीं। उनके रक्त से देवी के मंदिर का आँगन लाल हो गया था। वह अब तक मेरी आँखों के सामने नाच रहा है । महानायक ! क्षमा करो । -उसो हत्या का बदला चुकाने के लिए तो यशोधवल अब तक जा रहे हैं। तेरे रक्त से भूमि को रँगे बिना उसकी प्रेतात्मा कभी तृप्त न होगी। पितर प्यासे हैं, वे मुझे शाप देंगे । बंधुगुप्त ! जिस प्रकार तूने बालक कीर्तिधवल की हत्या की थी उसी प्रकार आज तुझे भी मरना होगा। इसी बीच शशांक काँपते हुए महानायक की ओर बढ़े और घुटने टेक हाथ जोड़कर बोले "पिता-"। सारे वन को कँपाते हुए वृद्ध महानायक ने कड़ककर कहा “पुत्र ! इस समय यहाँ से चले जाओ। यशोधवल इस समय पिशाच हो गया है । पुत्रहंता की रक्तपिपास ने उसे उन्मत्त कर दिया है। महासेनगुप्त के पुत्र का वचन व्यर्थ होगा । चले जाओ।" अपने को किसी प्रकार सँभालकर शशांक फिर बोले "भट्टारक ! थोड़ा धैर्य उनकी बात पूरी भी न हो पाई थी कि यशोधवल ने बाएँ हाथ से उन्हें दूर हटा दिया और दहने हाथ से तलवार खींची । सम्राट् दोनों हाथों से आँख मूंदकर वहाँ से हट गए। घड़ी भर में सम्राट की आज्ञा से वसुमित्र और हरिगुप्त ने उस पुराने मंदिर में जाकर देखा कि मंदिर का आँगन रक्त में डूब गया है। वज्रासन बुद्धदेव की मूर्ति के सामने संघस्थविर बंधुगुप्त का मृत शरीर पड़ा हुआ है और सर्वांग में रक्त लपेटे भीषण मूचि धारण किए महानायक उन्मत्तों के समान आँगन में नाच रहे हैं। देखते ही दो के दोनों काँप उठे। बड़ी कठिनता से यशोधवलदेव को किसी प्रकार रथ पर बिठा कर वे प्रासाद की ओर ले गए।