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( ३१५) सम्राट ने कई सैनिकों को बोधिद्रुम काटने की आज्ञा दी। भिक्खु लोग रोने चिल्लाने लगे। बोधिद्रुम की डालें और टहनियाँ कट कटकर गिरने लगीं। धीरे धीरे पेड़ी भी खोद डाली गई। वज्रासन का भारी पत्थर अपने स्थान से हट गया। नीचे सुरंग निकल आया, पर उसके भीतर बंधुगुप्त का कहीं पता न लगा। दिन डूबते डूबते सुरंग के छोर पर का लोहे वाला द्वार जब तोड़ा जाने लगा उस समय बंधुगुप्त गगन- स्पर्शी कुक्कुटपादगिरि के पास पहुंच गए थे। शशांक और यशोधवल- देव विफलमनोरथ होकर पाटलिपुत्र लौट गए। इस घटना के चवालीस वर्ष पीछे जब चीन देश से एक धर्मात्मा भिक्खु आया तब उससे विपथगामी भिक्खुओं ने कहा कि महाराज शशांक ने धर्मद्वेष के कारण परम पवित्र बोधिद्रुम को कटाया था। इससे पृथ्वी फट गई और वह उसके भीतर समाकर घोर नरक में जा पड़ा। अंत में अशोक के वंशधर पूर्णवर्मा की भक्ति और सेवा के प्रभाव से एक रात में ही बोधिद्रुम फिर ज्यों का त्यों हो गया। जड़ से उखाड़ा हुआ वृक्ष किस प्रकार एक ही रात में बढ़ कर साठ हाथ का हो गया यह बताना इस आख्यायिका का विषय नहीं, पर धर्मप्राण चीनी परि- वाज्रक ने यह कहानी ज्यों की त्यों अपने भ्रमणवृत्तांत में टाँक ली । LAR