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में मुग्ध होकर आप किसे सिंहासन पर बिठा रहे हैं ? युबराज शशांक अब् इस लोक में कहाँ है ? यह तो कोई धूर्त और भंड है।” बिजली की तरह कड़ककर महानायक सभामंडप को कँराते हुए बोछे “स्नो, दूत ! तुम अबध्य हो, नहीं तो इसी क्षण धड़ से तुम्हारा सिर अलग कर देता । मुझे इस संसार में आए नब्बे वर्ष हो गए। कौन धूर्च है, कौन प्रतारक है यह सब मैं अच्छी तरह जानता हूँ। तुम अपने को सच्चे सम्राट के सामने समझो और झटपट अभिवादन करो । धूर्त कौन है, पुत्र की माता से पूछो । हृषीकेशशर्मा, नारायण शर्मा, रामगुप्त, हरिगुप्त, रविगुप्त आदि पुराने राजपुरुषों से पूछो। थोड़ा सोचो तो कि अनंतवर्मा, वसुमित्र, माधववर्मा, आदि विद्रोही नायक किसके साथ पाटलिपुत्र आए है ? अब व्यर्थ बकवाद न करो, चुप रहो ।"

हंसवेग चुप । हृषीकेशशा और यशोधवलदेव ने हाथ पकड़कर शशांक को सिंहासन के ऊपर बिठाया । पौरांगनाएँ मंगलगीत गाने लगीं। एकत्र जन समूह की जयध्वनि आकाश में गूंजने लगी। महादेवी की आज्ञा से एक परिचारिका सोने के कटोरे में दही, चंदन, दूर्वा और अक्षत ले आई । ब्राह्मणों ने स्वस्तिवाचन किया, बड़े बूढ़े अमात्यों ने नए सम्राट को आशीर्वाद दिया। जब सब लोग अपने अपने आसन पर बैठ गए तब विनयसेन ने सिंहासन के पास जाकर अभिवादन किया और कहा “महाराजाधिराज ! आपका पुराना सेवक अल्ले तोरण पर खड़ा है । वह एक बार श्रीमान् को देखना चाहता है।" सम्राट ने तुरंत सामने ले आने की आज्ञा दी। बहुत देर पीछे बुढ़ापे से झुका हुआ एक अत्यंत जर्जर वृद्ध लाठी टेकता सभामंडप में आया । शशांक उसकी आकृति देख चकित हो गए। वे सिंहासन से उठकर उसकी ओर बढ़े। सभा में जितने लोग थे सब जय जयकार करने लगे।

शशांक को अपनी ओर आते देख लल्ल खड़ा हो गया। उसकी आँखों की ज्योति मंद पड़ गई थी, सूखे हुए गालों पर आँसुओं की