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( २९५) "छिः चित्रा ! ऐसी बात मुँह से न निकालो। अब मैं जाता हूँ। तुम अपने को सँभालो। युवराज कई पग हटे। चित्रादेवी उनकी ओर एकटक देखकर बोली "युवराज, शशांक ! तो क्या अब विदा है ?” भरे हुए गले से शशांक ने उचर दिया "हाँ चित्रा ! सब दिन के लिए विदा ।" देखते देखते नीचे गंगा में किसी भारी वस्तु के गिरने का शब्द हुआ। शशांक ने पीछे फिरकर देखा कि छत पर कोई नहीं है। गंगा के जल में मंडल सा बँधकर फैल रहा है, बीच में सहस्रों बुलबुले उठ रहे हैं। महाराज शशांक की आँखों के आगे अँधेरा सा छा गया । वे भी छत पर से गंगा में कूद पड़े। ईशान कोण पर बादल चढ़ रहे थे। देखते देखते वे चारों ओर घिर आए । वर्षा होने लगी । जगत् अंधकार में मग्न हो गया । तीसरा परिच्छेद पुनरुत्थान सम्रपट माधवगुप्त उदास मन सभा में बैठे हैं । सभासद भो उदास और सिर नीचा किए हैं। कल ही विवाह हुआ था और आज ही आमोद-प्रमोद की कौमुदीरेखा पर विषाद के घने मेघ छाए हुए हैं । क्या हुआ ? पट्टमहादेवी चित्रा का विवाह की रात से ही कहीं पता नहीं है । जो कभी राजसभा में नहीं आते थे वे भी आज आए हैं । वेदी के