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पर से उष्णीष उतार दिया। इतने में एक छोटे से बादल के टुकड़े ने आकर चंद्रमा को ढाँक लिया। उसके हटते ही फिर चाँदनी छिटक गई । चित्रादेवी ने देखा कि पुरुष सुंदर गौर वर्ण है, लंबे-लंबे पिंगल केश उष्णीष से छूट कर वायु के झोंकों से इधर-उधर लहरा रहे हैं । देखते ही वह कुछ कहती हुई चिल्ला उठी। पुरुष ने उसके निकट आकर कहा “कोई डर नहीं है, चित्रा ! मैं मनुष्य ही हूँ, प्रेत होकर नहीं आया हूँ।"

भय, विस्मय और हृदय की दारुण यंत्रणा से चित्रा देवी का जी घुटने लगा। बड़ी कठिनता से अपने को सँभाल कर उन्होंने कहा "तुम-कुमार-शशांक-"

पुरुष ने कुछ हँस कर कहा “पट्टमहादेवि ! मैं वही हूँ; वही शशांक हूँ। कभी कुमार भी कहलाता था, पर तुम्हारा वाल्य सखा था।"

“युवराज-तुम-"

"हाँ, चित्रा ! मैं ही हूँ। तुमने लौटने के लिए कहा था इसी से आया हूँ। मेरी बात तो रह गई।" चित्रादेवी घुटने टेक कर बैठ गई और रोते-रोते बोली “युवराज-युवराज-क्षमा करो-

"क्षमा किस बात की, चित्रा ? तुमने कहा था इसी से आया हूँ। वाल्य सखी की बात रखने के लिए मरा हुआ भी जी उठा है। क्षमा किस बात की चित्रा ?"

“युवराज, एक बार और क्षमा करो, बस एक बार । न जाने कितनी बार क्षमा किया है, एक बार और क्षमा करो।"

"क्षमा कैसी, चित्रा ? नगर में सुना कि तुम्हारा विवाह है; बस विवाह का उत्सव देखने के लिए मैं भी चला आया-" चित्रादेवी रोते-रोते शशांक के पैर पकड़ने जा रही थीं, पर वे दो हाथ पीछे हट कर कहने लगे “छिः छिः चित्रा? यह क्या करती हो? तुम मेरे छोटे