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दूसरा परिच्छेद चित्रा का दिन पाटलिपुत्र नगर में आज बड़ी चहलपहल है। तोरण तोरण पर मंगल वाद्य बज रहे हैं। राजपथ रंग बिरंग की पताकाओं और फूल- पत्तों से सजाया गया है। दल के दल नागरिक रंग विरंगे और चित्र विचित्र वस्त्र पहने ढोल, झाँझ आदि बजाते और गाते निकल रहे हैं। पहर पहर भर पर नगर में तुमुल शंखध्वनि हो रही है। पौरांगनाएँ ऊपर से लावा और श्वेत पुष्प वरसा रही हैं । धूप के सुगंधित धुएँ से छाए हुए मंदिरों में से नगाड़ों और घंटों की ध्वनि आ रही है। आज सम्राट् माधवगुप्त का विवाह है। दो पहर के समय एक वावृत पुरुष प्रधान राजपथ पकड़े राज- प्रासाद की ओर जा रहा है । उसे देख मद्य से मतवाला एक नागरिक बोल उठा "यह देखो ! गौड़ की सेना वर्म से ढकी हुई विवाह में जा रही है। उसकी बात पर उसके साथी तालियाँ पीट पीट कर हँसने लगे । सैनिक उसकी और फिर कर उससे पूछने लगा "राजभवन का यही मार्ग है ?" नागरिक बोला “हाँ! सीधे उत्तर चले जाओ”। सैनिक बढ़ ही रहा था कि इतने में वह नागरिक बोल उठा “भाई ! ये चित्रादेवी कौन हैं ?" दूसरे नागरिक ने कहा "अरे, तू नहीं जानता। वही मंडलागढ़ के तक्षदत्त की कन्या" । "कौन ! वही जिसके साथ युवराज शशांक के विवाह की बात- चीत थी?"