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(२७३ ) ही उसके शरीर में आग लग गई। भव का ऐसा व्यवहार वह न जाने कितने दिनों से देखता आता था, पर वह देख कर भी नित्य अपने को किसी प्रकार सँभाल कर काम-काज में लग जाता था। पर आज वह आपे के बाहर हो गया। सिर से पैर तक वह आग-बबूला हो गया, उसके रोम-रोम से चिनगारियाँ छूटने लगीं। नवीन कहीं से लोहे का एक अंकुश उठा लाया था। उसे हाथ में लिए वह एक पेड़ की आड़ में छिप रहा। थोड़ी देर में दीनानाथ की पुकार सुन कर भव वहाँ से चली गई। पागल एक पेड़ की जड़ पर बैठा-बैठा पानी थपथपाने लगा। नवीन ने. पास जाकर पुकारा "पागल !" "क्या है ?" "इधर आ ।" पागल कुछ न कह कर पास आ खड़ा हुआ । नवीन बोला "तू क्या करता था ?" "भव के साथ बैठा था।" "क्यों बैठा था ?' "न बैठता तो भव रूठ जाती।" 'तू क्या भव को चाहता है ?" "हाँ ! चाहता हूँ।" "क्यों ?" "भव का गाना बड़ा अच्छा लगता है।" "मैं तुझे मार डालूँगा।" "क्यों मारोगे, नवीन ?" "तू भव को प्यार करता है इसी लिए )" "मैं तो तुम्हें भी प्यार करता हूँ।"