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(२५१) पर अस्त्रों की चोट के चिह्न थे, माथे पर बाई ओर जो घाव था वह अभी अच्छी तरह सूखा तक न था । धीवर के घर ऐसा रूप कभी किसी ने नहीं देखा। इसी से वह धीवर की बेटी रह-रह कर टकटकी बाँध उसकी ओर देखती रह जाती और वह युवक अजान बालक के समान भोलेपन के साथ उसकी हाथ की सफाई और फुरती देखता था। इतने में एक और युवक धीरे-धीरे उनके पीछे आ खड़ा हुआ। उन दोनों को इसका कुछ भी पता न लगा। आए हुए पुरुष के एक हाथ में लंबा भाला और दूसरे हाथ में भीगा हुआ जाल था । थोड़ी देर तक तो वह युवक-युवती के हाव-भाव देखता रहा, फिर पूछने लगा "भव, क्या कर रही है ?” युवती ने चौंक कर ऊपर ताका और बोली "तेरे क्या आँख नहीं है, देखता नहीं है कि मैं क्या कर रही हूँ ?" उस पुरुष ने भाले को अच्छी तरह थाम कर कहा “देखता तो हूँ, पर समझता नहीं हूँ।" भव-तब फिर खड़ा क्या है ? चला जा । पुरुष-मैं न जाऊँगा । बुड्ढा कहाँ है ? "घर में सो रहा है।" वह पुरुष झोपड़े की ओर बढ़ा। यह देख युवती उसे पुकार कर बोली (नवीन)! नवीन ! उधर कहाँ जाते हो ?" "बुड्ढे को बुलाने ।” "वह बहुत थक कर सोया हुआ है, उसे जगाना मत ।" युवक लौट आया। पर युवती ने उसकी ओर आँख उठा कर देखा तक नहीं । वह चुपचाप अपना जाल बुनती रही। थोड़ी देर आसरा देख अंत में उसने युवती को पुकारा “भव ?” कोई उत्तर नहीं "भव !" "क्या है ?"