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( २४६) हो गया। वसंत के आरंभ में फिर युद्ध का आयोजन होने लगा । इसी बीच युवराज अपनी सेना सहित आकर यशोधवलदेव के साथ मिले महानायक का शिविर अत्र धवलेश्वर के तट पर खड़ा हुआ। लंबी यात्रा के पीछे युवराज की सेना विश्राम चाहती थी। यशोधवलदेव की भी इच्छा थी कि कुछ दिन युद्ध बंद रखकर सेना को थोड़ा विश्राम दिया जाय। पर गौड़ के सामंतों ने कहा कि यदि ग्रीष्म के पहले युद्ध समाप्त न हो जायगा तो फिर एक वर्ष और लग जायगा, क्योंकि वर्षाकाल में बंगदेश में युद्ध करना असंभव है। युद्ध चलने लगा। चैत बीतते बीतते सुवर्णग्राम पर अधिकार महानायक और युवराज ने विक्रमपुर पर आक्रमण किया । गौड़ीय सामंतों की सहायता से छोटी बड़ी बहुत सी नावों का बेड़ा इकट्ठा हो गया था। पदातिक सेना को भी धीरे धीरे जलयुद्ध का अभ्यास हो गया था । अश्वारोही सेना को शिविर में रखकर महानायक, युवराज, वीरेंद्रसिंह, वसुमित्र और माधवर्मा ने नावों को बहुत से दलों में बाँटकर विद्रोहियों पर चारों ओर से आक्रमण किया । विद्रोही सेना घबराकर पीछे हटने लगी। वैशाख लगते ही युद्ध प्रायः समाप्त हो चला था। विजय प्राप्त करके युवराज बड़े वेग से दक्षिण की ओर बढ़ रहे थे । अकस्मात् विद्रोहियों की एक सहस्र से अधिक नौसेना मेघनाद के तट पर उनपर टूट पड़ी। युवराज के साथ बीस नावें और चार सौ सैनिक थे। वीरेंद्रसिंहकी सेना उस समय वहाँ से पंद्रह कोस पर थी और यशोधवलदेव का शिविर वहाँ से दस दिन का मार्ग था । प्रस्थान के समय महानायक ने विद्याधरनंदी नाम के एक वृद्ध सामंत को युवराज के साथ कर दिया था । ' उन्होंने कुमार से धीरे धीरे पीछे हट चलने को कहा। पर उनके परामर्श पर ध्यान नहीं दिया गया युवराज और अनंतवा युद्ध करने पर तुले हुए थे। उन्होंने स्थिर