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( २२४ ) "क्यों ? आप सेना को दो दलो में बाँट दीजिए । वंगदेश के लिए कोई दो सहस्र आश्वारोही और नावों का सारा बेड़ा रखकर शेष अश्चरोही और पदातिक सेना का आधा कामरूप की ओर भेज दिया जाय ।" "इस सेना का परिचालन कौन करेगा?" “आप की आज्ञा हो तो मैं कर सकता हूँ, अथवा नरसिंह या माधव कर सकते हैं। "पुत्र ! इस युद्ध में तुम्हीं सेनापति होकर जाओ। भगदत्त का वंश यद्यपि समुद्रगुप्त के वंश के जोड़ का नहीं है, पर बहुत प्राचीन राज- वंश है। भास्कर वर्मा भी अवस्था में तुम्हारे ही समान तरुण हैं। विद्रोह दमन में अर्थ का लाभ तो है, पर उतना यश नहीं है। तुम आगे बढ़ कर यदि भास्कर वर्मा को पराजित कर सकोगे तो युद्ध' शीघ्र ही समाप्त हो जायगा। सब की सब सेना यदि एक साथ वंग देश पर आक्रमण करेगी तो विद्रोह का दमन करने में अधिक दिन न लगेंगे। यदि किसी कारण से तुम पराजित हुए तो तुम्हारी पृष्ठ रक्षा के लिए मैं पहुँच जाऊँगा । तुम्हारे साथ कौन-कौन जायगा ?" नरसिंह, माधव, वीरेंद्र, वसुमित्र इत्यादि सब के सब एक घर से... बोल उठे "मैं जाऊँगा ।' पीछे से नितांत नवयुवक अनंत वर्मा भी बोल उठे "प्रभो ! मैं भी जाऊँगा ?" यशोधवल ने हँस कर कहा "भाई ! तुम लोग सब के सब चले जाओगे तो फिर मेरे साथ यहाँ कौन रहेगा ?" महानायक की इस बात पर सब ने सिर नीचा कर लिया, कोई कुछ न बोला । • यशोधवलदेव बोले "सुनो, तुम सब लोग अभी नव- युवक हो । युवराज के साथ किसी पुराने और अनुभवी सैनिक को जाना चाहिए। उनके साथ वीरेंद्र सिंह जायँगे । नरसिह, माधव और अनंत इन तीनों में से कोई एक और भी जा सकता है।"