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(१८६) पुरुष-अवश्य लौटूंगा। दूकान से उठ कर वह पुरुष एक पतली गली से होता हुआ राज- पथ पर आ निकला और दक्षिण की ओर जल्दी-जल्दी चलने लगा। कुछ दूर चलने पर जब उसने अच्छी तरह समझ लिया कि कोई पीछे- पीछे नहीं आ रहा है, तब वह पश्चिम की ओर मुड़ा। कई पतली अँधेरी गलियों से होता हुआ वह पश्चिम तोरण पर पहुँचा। उसने देखा कि फाटक अभी खुला है, मार्ग के किनारे बहुत से दीपक जल रहे हैं और अश्वारोही सेना के दल पर दल तोरण से होकर नगर के बाहर निकल रहे हैं। उसने यह भी देखा कि प्रतीहार लोग और किसी को नगर के बाहर नहीं जाने देते। तोरण के इधर उधर बहुत से नागरिक सेना की यात्रा देख रहे हैं। उस पुरुष ने भीड़ में से एक व्यक्ति से पूछा "भाई, कह सकते हो कि ये लोग कहाँ जा रहे हैं ?" उसने कहा "न, यह कोई नहीं जानता।" वह भी भीड़ में मिलकर सेना की यात्रा देखने लगा । अश्वारोहियों का एक दल निकल गया, उसके पीछे कई सेनानायक धीरे धीरे जाते दिखाई पड़े। उनमें से एक नवयुवक ने पास के एक पुराने सेनानायक से पूछा "इस समय चरणाद्रि दुर्ग में सेना भेजने की क्या आवश्यकता है, कुछ समझ में नहीं आता" | वह प्रवीण सेनानायक कुछ हँसकर बोला “इसीसे लोग कहते हैं कि बालकों के सामने कोई गुप्त बात नहीं कहनी चाहिए । इतनी ही देर में सेनापति की आज्ञा भूल गए ?" वह पुरुष अँधेरे में तोरण के एक कोने में छिपा हुआ यह बात सुन रहा था। सेनानायकों के निकल जाने पर अश्वारोहियों का दूसरा दल आया। उसके आते ही वह व्यक्ति अँधेरा पकड़े हुए पूर्व की ओर जाने लगा। तीन पहर रात जाते जाते वह पुरुष कपोतिक संघाराम के तोरण के भीतर घुसा। पहर बीतने पर नगर के तोरणों पर से बाजे की ध्वनि