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पहला परिच्छेद स्कंदगुप्त का गीत पूर्वोक्त घटना हुए तीन वर्ष हो गए । इन तीन वर्षों के बीच मगध राज्य और पाटलिपुत्र में अनेक परिवर्जन हुए हैं। प्राचीन नगरी की शोभा मानो फिर लौट आई है। नगरप्राकार का पूर्ण संस्कार हो गया है, पुराने प्रासाद का जीर्णोद्धार हो गया है, राज्यकार्य सुव्यवस्थित रूप से चल रहा है, मगध साम्राज्य में फिर से नई शक्ति सी आ गई है, सीमा पर के सब दुर्ग सुदृढ़ और सुरक्षित हैं, साम्राज्य के दारिद्रग्रस्त होने से जो सेना पहले विशृंखल हो रही थी वह अब पूर्ण सुशिक्षित और सुसजित हो गई है, उसे अब वेतन के लिए या अन्न के लिए गौलिमकों का घर नहीं घेरना पड़ता । घोर नींद में सोए हुए मगधवासी अब जाग गए हैं। उनके मन में अब आशा के अंकुर दिखाई पड़ने लगे हैं। जान पड़ता है चंद्रगुप्त और समुद्रगुप्त का समय फिर आया चाहता है, फिर पाटलिपुत्र के नागरिकों की जयध्वनि गांधार के तुषारधवल गिरिशृंगों के बीच सुनाई देगी, फिर मगध का गरुड़ध्वज वक्षु के तट पर दिखाई देगा, फिर केरल देश तक के शत्रुओं की स्त्रियाँ अकाल वैधध्य के संताप से कोसेंगी । इस काया- पलट के प्रत्यक्ष कारण हैं युवराज शशांक और परोक्ष कारण हैं वृद्ध महा- नायक यशोधवलदेव ।

  • आक्सस नदी या सर दरिया जो मध्य एशिया में है।