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बाईसवाँ परिच्छेद बंधुगुप्त की खोज तरला के मुँह से कीर्तिधवलदेव की हत्या का व्योरा सुनकर यशो- धवलदेव आपे से बाहर हो गये थे। बहुत कष्ट से अपने को किसी प्रकार सँभाल कर वे वसुमित्र और तरला को प्रासाद के भीतर सम्राट के पास ले गए । वृद्ध सम्राट् हत्या का पूरा ब्योरा सुनकर बालकों की तरह रोने लगे । महाबलाध्यक्ष हरिगुप्त वहाँ उपस्थित थे। उन्होंने और यशोधवलदेव ने मिलकर किसी प्रकार सम्राट को शांत किया। उसके पीछे हरिगुप्त बोले “जहाँ तक मैं समझता हूँ बंधुगुप्त को अभी तक यह पता न होगा कि कीचिंधवल की हत्या की बात फैल गई है। हम लोग यदि इसी समय अश्वारोही सेना लेकर पुराने मंदिर और संघाराम को धेरें तो वह अवश्य पकड़ा जायगा। वह यदि भागा भी होगा तो कितनी दूर गया होगा, हम लोग उसे पकड़ लेंगे" | सम्राट् ने बड़े उत्साह के साथ इस प्रस्ताव को स्वीकार किया और कहा “तुम लोग सेठ के लड़के को साथ लेकर अभी जाओ, इसके द्वारा सब स्थानों का ठीक ठीक पता लगेगा'। यशोधवलदेव ने वसुमित्र से पूछा घोड़े पर चढ़ सकते हो ?" वसु०-हाँ, मुझे घोड़े पर चढ़ने का अभ्यास है। यशो०-संघाराम में फिर लौट कर जाने में तुम डरोगे तो नहीं ? वसु०-प्रभो ! मैं अकेला, निरस्त्र, असहाय और निरुपाय हो कर तो संघाराम में रहता ही था, अब महाराजाधिराज की छत्र छाया के नीचे मुझे किस बात का भय है ? "तुम 9