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(१४१) इन्हीं सब बातों की चिंता से वह अधीर हो रही थी। रात भर की वह जागी हुई थी, इससे बीच बीच में उसे झपकी भी आ जाती थी। एक- बार झपकी लेकर जो उसने सिर उठाया तो देखा कि पुराने प्रासाद के सामने कुछ दूर पर लंबे डील का वृद्ध पुरुष इधर उधर टहल रहा उसने घबराकर वसुमित्र से पूछा “सम्राट निकले क्या ?” वसुमित्र ने कहा "अभी तो नहीं ।” तरला ने फिर पूछा “तो वह टहल कौन रहा है ?" वसुमित्र ने कहा “मैं नहीं जानता।" तरला अब चुपचाप बैठी न रह सकी । वह उठकर धीरे धीरे उस दीर्घकाय वृद्ध पुरुष की ओर बढ़ी और उसने दूर से उसे प्रणाम किया । वृद्ध ने पूछा “तुम कौन हो ? क्या चाहती हो?" तरला सचमुच रो पड़ी और सिसकती सिसकती बोली “धर्मावतार ! आप कौन हैं, यह तो मैं नहीं जानती । पर यह देखती हूँ कि आप पुरुष हैं और निस्संदेह कोई ऊँचे पदाधिकारी हैं । मैं बड़ी विपत्ति में पड़कर सम्राट की शरण में आई हूँ। सम्राट् यदि रक्षा न करेंगे तो किसी प्रकार रक्षा नहीं हो सकती । मैं इस नगर के एक सेठ की दासी हूँ। मेरे सेठ की लड़की के साथ सेठ चारुमित्र के एकमात्र पुत्र वसुमित्र के विवाह की बातचीत थी। चारुमित्र बौद्ध हैं, इससे वे यह संबंध नहीं होने देना चाहते थे। मेरे सेठ वैष्णव हैं । चारुमित्र ने द्वेष के वशीभूत होकर और बौद्ध भिक्खुओं की लंबी चौड़ी बातों में आकर अपने एकमात्र पुत्र को बलि चढ़ा दिया। उन्होंने जन्म भर की संचित सारी संपत्ति बौद्ध संघ को दान करने का संकल्प करके अपने पुत्र को भिक्खु हो जाने के लिए विवश किया, क्योंकि भिक्खु हो जाने पर फिर संपत्ति पर अधिकार नहीं रह जाता । वसुमित्र के वियोग में अपने सेठ की कन्या को प्राण देते देख मैं उनकी खोज में निकली। नगर के बाहर एक बौद्ध मठ में वमित्र का पता पाकर मैं कल रात को उन्हें वहाँ से बड़े बड़े कौशल से निकाल लाई । पर अब कहीं शरण ढूँढ़ती हूँ तो नहीं पाती हूँ। मैं इस