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(१३४ ) के समय की दुर्दशा की बात जनपदवासी भूल गए हैं । हूणों के प्रबल प्रवाह में पड़कर पुरुषपुर और कान्यकुब्ज ध्वस्त हो गए, किंतु पाट- लिपुत्र के दुर्ग प्राकार की छाया तक वे स्पर्श न कर सके । साम्राज्य का ध्वंस होते ही देश का सर्वनाश हो जायगा । तुम्हारे पिता वृद्ध हैं, तुम दोनों कुमार अभी बालक हो । पूर्व में सुप्रतिष्ठित वर्मा और पश्चिम में प्रभाकरवर्द्धन घात लगाए केवल सम्राट की मृत्यु का आसरा देख रहे हैं । कोई उपाय न देख तुम्हारे पिता चुपचाप बैठ गए हैं । पर क्या इस प्रकार हाथ पर हाथ रखकर बैठ रहना पुरुषोचित कार्य है ? जो आत्मरक्षा में तत्पर न रह भाग्य के भरोसे पर बैठे रहते हैं, मैं समझता हूँ, उनके समान मूर्ख संसार में कोई नहीं । यत्न के बिना साम्राज्य की क्या दशा हो रही है, थोड़ा सोचो तो। सीमा पर के जितने दुर्ग हैं, संस्कार और देखरेख के बिना निकम्मे हो रहे हैं । सेना और अर्थ के अभाव से वे शत्रु का अवरोध करने योग्य नहीं रह गए हैं । नियमित रूप से राजस्व राजकोष में नहीं आ रहा है । भूमि के जो साम्राज्यप्रतिष्ठित अधिकारी थे वे अधिकारच्युत हो रहे हैं, उनके स्थान पर जो नए अधिकारी बन बैठे हैं वे राजकर्मचारियों की आज्ञा पर ध्यान नहीं देते । फल यह है कि राजकोष शून्य हो रहा है। बहुत दिनों से इधर पाटलिपुत्र के दुर्गप्राकार और नगरप्राकार का संस्कार नहीं हुआ है । खाइँयों में जल नहीं रहता है, कुछ दिनों में वे पटकर खेत हुआ चाहती हैं । इस समय यदि कहीं से कोई चढ़ आवे तो हम लोगों की पराजय निश्चय है। "मैं सम्राट के पास पितृहीना लतिका के लिए अन्न की भिक्षा माँगने आधा था। किंतु मैंने आकर देखा कि जो अन्नदाता हैं, उन्हींके यहाँ अन्न का अभाव हो रहा है। बहुत दिन पहले जब तुम्हारे पिता जी राजसिंहासन पर बैठे थे, तब एक बार मैंने साम्राज्य का कार्य चलाया था। आज फिर साम्राज्य की दुर्दशा देखकर कार्य का भार