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शक्र०- वंधु०-प्रासाद में नियुक्त गुप्तचरों ने संवाद दिया है। गंगाद्वार पर शशांक के साथ यशोधवल का परिचय हुआ। कुमार के साथ ही साथ वह गंगाद्वार से ही होकर सभामंडप में गया । यशोधवल अभी जीवित है, पहले तो सम्राट को इस बात पर विश्वास ही नहीं हुआ। जब यशोधवल ने सभामंडप में प्रवेश किया तब सम्राट स्वयं वेदी से नीचे उतर आए और उन्होंने उसे गले से लगा लिया । सभा में जाकर वृद्ध' यशोधवल ने यह कहा कि मैं अपनी पौत्री के लिए अन्न की भिक्षा माँगने आया हूँ। बुद्ध०-ठीक है । सम्राट के साथ उसकी और क्या क्या बातचीत हुई, कुछ सुना है ? -कुछ भी नहीं। वह सम्राट के साथ अंतः पुर तक जाता है, पट्टमहादेवी के घर में भोजन करता है, इससे विष देने का भी कोई उपाय नहीं हो सकता। यशोधवल के आने पर एक बार मंत्रणासभा हुई थी, पर वहाँ क्या क्या हुआ, कोई कुछ भी नहीं कह सकता । उस समय स्वयं विनयसेन पहरे पर था बुद्ध -प्रासाद में रहनेवाले गुप्तचरों की संख्या दूनी कर दो और आज से जिन भिक्खुओं पर पूरा विश्वास हो, उन्हें छोड़ और किसी को इस काम में मत लेना। बंधु -अब आगे मंत्रणा का क्या उपाय होगा ? मैं देखता हूँ कि मुझे वंगदेश लौट जाना पड़ेगा। बुद्ध०- --क्यों ? बंधु०-मैं ही यशोधवल के पुत्र की हत्या करनेवाली हूँ, इस बात का पता उसे बिना लगे न रहेगा। मंदिर के भीतर निरस्त्र पाकर बकरे की तरह मैंने उसके पुत्र को काटा है। जहाँ यह बात उसने सुनी कि वह न जाने क्या क्या कर डालेगा। यशोधवल कैसा विकट मनुष्य है,